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ये बहाना नहीं चलेगा कि मैं एक लड़की हूं.....

Posted On: 16 Dec, 2013 मेट्रो लाइफ में

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नब्बे के दशक में भारत में डिजाइनर  होटल्स की शुरुआत करने वाली प्रिया पॉल ने खराब आर्थिक स्थितियों में भी अपना रास्ता खुद तय करने का निर्णय लिया। पिता की असामयिक मृत्यु के बाद उनके सपनों को पूरा करने और विरासत को आगे बढाने में प्रिया और उनके भाई-बहन ने कडी मेहनत की है। प्रिया से मुलाकात कनॉट प्लेस स्थित ऑफिस में हुई। आत्मविश्वास से भरपूर, मजबूत व्यक्तित्व वाली प्रिया से बातचीत में उनकी शालीनता, संतुलन और शब्दों पर नियंत्रण झलकता है। कामयाबी की उनकी राह कितनी आसान या पथरीली रही, जानते हैं प्रिया से।


women empowermentप्रिया जब आपने कंपनी जॉइन की थी, आप सिर्फ 22 साल की थीं। आप यूएस में पढ रही थीं, फिर ऐसी कौन सी बात थी, जिसने आपको बिजनेस में आने को प्रेरित किया?

हमारी जॉइंट बिजनेस  फेमिली  थी। हम सब.. मेरे पिता और उनके भाई साथ रहते थे, साथ काम करते थे। बचपन से ही माता-पिता ने मुझे और छोटी बहन को ऐसा माहौल दिया कि हम अपने सपने पूरे कर सकें। उन्होंने हमेशा प्रोत्साहन दिया। हमारे घर में ऐसे बैरियर्स नहीं थे कि लडकियां हैं तो फेमिली  बिजनेस जॉइन  नहीं करना चाहिए। मुझे लगता है कि 25 साल पहले यह असाधारण बात थी। मैंने बहुत कम उम्र में फेमिली  बिजनेस जॉइन  करने के बारे में सोचा। जैसे ही कॉलेज  पूरा हुआ, पिता ने मुझे बुलाया और मैं बिजनेस  में आ गई।


तो जब आपने यूएस जाने के बारे में सोचा तो परिवार की ओर से कोई रुकावट नहीं आई..

..नहीं-नहीं, मेरे पापा, अंकल, कजंस सभी यूएस में थे। मैंने 10-12 की उम्र में ही सोच लिया था कि मुझे यूएस से अंडर-ग्रेजुएट कोर्स करना है। ..तो हम जो भी करना चाहें-कर सकते थे। घर में इसे लेकर कोई बैरियर्स कभी नहीं थे।


आप कोलकाता में पलीं-बढीं। वहीं से स्कूलिंग हुई?

हां-हां। मेरी स्कूलिंग वहीं से हुई। 12वीं तक मैं कोलकाता में थी। इसके बाद मैंने यूएस के वैल्सले कॉलेज से इकोनॉमिक्स  में चार साल का बीए कोर्स किया। हालांकि इकोनॉमिक्स  मेरा पहला प्यार नहीं था, मगर मैं बिजनेस  में आना चाहती थी। मैं पढाई के हर एक क्षण को एंजॉय  कर रही थी, क्योंकि वैल्सले एक लिबरल आर्ट कॉलेज  था। यह अन्य महिला कॉलेजों से काफी अलग था, जहां अकादमिक और सांस्कृतिक शिक्षा (म्यूजिक,आर्ट) के सभी पहलुओं पर ध्यान दिया जाता था..। वहां किसी भी क्षेत्र में एक्स्प्लोर  किया जा सकता था। फिर मैं वापस आई और पिता के साथ दिल्ली के पार्क होटल में मार्केटिंग मैनेजर के तौर पर काम करना शुरू किया। कुछ साल काफी मुश्किलों भरे थे। जब 1988  में मैंने कंपनी जॉइन  की थी, इकोनॉमी  की हालत भी ठीक नहीं थी। फिर 1991-92  में बूम आया। भारत में उदारीकरण शुरू हुआ। शुरू के कुछ साल काफी कठिन थे, लेकिन इन सालों ने हमें सिखाया कि कैसे बिजनेस खडा किया जाता है, कैसे हर उतार-चढाव का सामना किया जाता है।


और क्या आपकी मां भी बिजनेस से जुडी थीं?

हां, समय-समय पर वह भी बिजनेस में मदद करती थीं। जब पापा थे, तब वह स्कूल्स  देखती थीं। कुछ समय एक होटल का मैनेजमेंट भी संभाला। पापा के बाद मेरे अंकल ने मां को कंपनी का चेयरपर्सन  नॉमिनेट  किया। कुछ साल वह इस पद पर रहीं..।


आप बहुत छोटी थीं, जब आपके पिता का साथ छूट गया। दुख की उस घडी से आप कैसे उबरीं? कठिन वक्त से जूझने की ताकत आपको कैसे मिली? हमसे कुछ शेयर करेंगी?

मेरा पूरा परिवार मेरे साथ खडा था। मेरी मां, भाई-बहन, कजंस  सभी साथ थे। सभी को पिता के जाने का दुख था, हमने मिलकर इस दुख का सामना किया था, एक-दूसरे को सहारा दिया और एक-दूसरे से ताकत हासिल की। हमारे सामने कई चुनौतियां थीं। मां के लिए बेहद मुश्किल दौर था। उन्हें बिजनेस  मैनेज  करना था, अपनी विरासत को आगे ले जाना था। (सोचते हुए) परिवार का हर व्यक्ति झेल रहा था, लेकिन हम साथ थे और यही हमारी ताकत थी। ..जब परिवार साथ होता है, दोस्त होते हैं तो धीरे-धीरे हम उबर जाते हैं..(सोचते हुए)।


आपने अपने पिता के साथ काम किया। उनके काम करने का कोई तरीका जिसे आप मानती हों, इंडस्ट्री का कोई ट्रेड सीक्रेट जो उन्होंने बताया हो या फिर पिता से जुडी कोई यादगार बात हो तो शेयर करें..

(हंसते हुए) मेरे पिता बहुत खुशमिजाज व्यक्ति थे। काम और डिटेल्स  को लेकर उनका अटेंशन बहुत अलग था। उनका मोटो था- वर्क हार्ड, प्ले हार्ड, एंजॉय  योर सेल्फ।  वह अपने फलसफे को जीते थे। ..मुझे लगता है कि हम सभी को काम और मौज-मस्ती के बीच बैलेंस बना कर चलना चाहिए। हम भाग्यशाली हैं कि पैसे के अलावा  हम अपनी संतुष्टि के लिए काम कर रहे हैं। कुछ न कुछ रचनात्मक करते रहते हैं। यही एक बात हमें बहुत सारी खुशी  और संतुष्टि देती है।


आप कला की कद्रदान हैं, आपके होटल्स  में यह कला-प्रेम दिखता है। डिटेल्स को लेकर पिता से आपने भी कुछ सीखा?

(हंसते हुए)..वह भी हमेशा होटल्स  के लिए पेंटिंग्स या कलाकृतियां खरीदते रहते थे। बचपन में वह हमें कोलकाता  में कला-प्रदर्शनियों में ले जाते थे। शायद वहीं से हमारे भीतर आर्ट के प्रति प्रेम पैदा हुआ। हम बचपन से इन सारी चीजों  की समझ रखते थे।


आपके सिब्लिंग्स भी बिजनेस में हैं। परिवार के लोगों के साथ काम करना कितना आसान या मुश्किल होता है?

किस्मत से हमारा बिजनेस  बहुत बडा है। हम शिपिंग,  हॉस्पिटैलिटी,  फाइनेंस, टी, रीटेल और कई अन्य तरह के बिजनेस में हैं, इसलिए इसमें ज्यादा लोगों की जरूरत है। सभी को पर्सनल फ्रीडम है, स्पेस  है और सबके अपने अलग-अलग काम हैं। पिछले दस सालों में हमने एक फेमिली कॉन्स्टीट्यूशन भी बनाया है। हम कैसे एक-दूसरे से ऑपरेट  करेंगे, हमारी रणनीति क्या होगी, हमारे इन्वेस्टमेंट क्या होंगे, इसे लेकर हम बातचीत करते हैं। हमारा काम इंटरकनेक्टेड है। हमारी आदतें, स्वभाव अलग-अलग हैं, लेकिन हम एक-दूसरे से सलाह लेते हैं और अनुभव बांटते हैं। यह एक अच्छी प्रक्रिया है, इसी के जरिये हम बिजनेस  को आगे बढाते हैं..। चूंकि हम एक साथ पले-बढे हैं तो हमारे बीच एक कॉमन ग्राउंड भी है बातचीत का। हमारी सोच एक जैसी है। मैं घर में बडी हूं और प्रीति मुझसे पांच साल छोटी है। छोटा भाई करन है। मां फाउंडेशंस और स्कूल्स देख रही हैं।


ग्लोबलाइजेशन के दौर में कैसी चुनौतियां आईं आपके सामने?

देखिए, हॉस्पिटैलिटी  हमेशा से एक ग्लोबल बिजनेस  रहा है। क्योंकि यह न सिर्फ अपने देश के, बल्कि विदेशों से आने वाले ट्रैवलर्स पर निर्भर करता है। हालांकि इकोनॉमी की स्थिति बहुत ठीक नहीं रही है, लेकिन हमें अपने यहां इंटरनेशनल स्टैंडर्ड के प्रोडक्ट्स और सर्विस रखनी पडती है..। वर्ष 1991-92 में पोस्ट-लिबरलाइजेशन के दौर में स्थितियां बदली हैं। वैसे तो हमारे यहां लगभग 40 वर्षो से तमाम अंतरराष्ट्रीय ब्रैंड्स रहे हैं, मगर पिछले 10 सालों में सकारात्मक बदलाव आए हैं। ब्रैंड्स बढे, जो इंडस्ट्री के लिए अच्छा संकेत है। शहरों की स्थिति बदली है। अब कस्टमर्स  के पास कई विकल्प हैं..।


क्या होटल बिजनेस पुरुष वर्चस्व वाला क्षेत्र है?

नहीं..पूरी तरह तो नहीं..। (सोचते हुए) देखिए, हर इंडस्ट्री में सीनियर पदों पर पुरुष होते हैं। हमारी इंडस्ट्री में भी सीनियर व मैनेजमेंट स्तर पर स्त्रियां कम हैं। कंपनी हेड में 3-4 महिलाएं हैं। लेकिन यह इंडस्ट्री स्त्रियों के लिए खुली हुई है। जूनियर या मिड लेवल पर बहुत स्त्रियां हैं। पीआर, कम्युनिकेशन, फ्रंट ऑफिस, हाउसकीपिंग, एचआर में हैं। लेकिन शेफ का काम उनके लिए मुश्किल होता है। वे शेफ की तरह जॉइन तो करती हैं लेकिन फिर या तो अलग हो जाती हैं या अपना रेस्टरां खोल लेती हैं। दरअसल फूड और बेवरेजेज  में काम के घंटे लंबे होते हैं और स्त्रियां पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण इसमें कंफर्टेबल नहीं होतीं। लेकिन बाकी स्तरों पर 22-23  प्रतिशत स्त्रियां हैं और मैं समझती हूं कि यह एक हेल्दी  नंबर है। मैनेजमेंट और एग्जीक्युटिव स्तर पर भी स्त्रियां काफी हैं..।


तो स्त्री होने के नाते आपके सामने कोई रुकावट नहीं आई?

नहीं, बिलकुल नहीं। मेरे लिए राहें सुगम रहीं। हम भाग्यशाली थे कि हमें अच्छी शिक्षा मिली, परिवार का सपोर्ट मिला। कभी ऐसा नहीं लगा कि लडकी हूं तो ऐसे रहना है या वैसे रहना है।


घर और काम के बीच संतुलन कैसे बिठाती हैं? परिवार, खासतौर पर पति का कितना सपोर्ट मिलता है?

(सोचते हुए) मुझे लगता है बिना परिवार के सपोर्ट के कोई स्त्री आगे नहीं बढ सकती। मेरी मां और पति ने बच्चे की परवरिश में बहुत मदद की है। सास-ससुर ने भी सहयोग दिया। अभी मेरा बेटा साढे आठ साल का है। उसकी कई तरह की जरूरतें  हैं और मुझे हमेशा उसके साथ रहने की भी जरूरत है। तो कई बार संडे या रात में काम करना पडता है। मैं मानती हूं कि हर दिन परफेक्ट नहीं होता, लेकिन.. मैनेज करना पडता है। मुझे लगता है, पुरुषों को भी यह सब मैनेज करके चलना पडता है..।


विदेशों से आने वाले लोगों को इंडियन फूड और कल्चर में क्या चीज आकर्षित करती है?

देखिए, हमारा पार्क होटल लगभग 50 साल पुराना है। हमने हमेशा कंटंपरेरी  इंडिया की झलक दिखाई है। हमारे होटल्स  इंटरनेशनल और भारत के शहरों से आने वाले लोगों के लिए एक तरह का हब हैं। म्यूजिक,  डांस.. और शहर में हो रही हर गतिविधि से वे कनेक्ट  करते हैं..। हमने यहां हर उस चीज  का समावेश किया है, जहां वे खुद  को कनेक्ट  कर सकते हैं। यही बात पार्क होटल्स को खास बनाती है।


अपने इतने व्यस्त समय में मी टाइम कैसे मैनेज  करती हैं?

मी टाइम? (जोर से हंसते हुए)। ..मुझे लगता है कि यह सवाल काम और मौज-मस्ती के बीच बैलेंस बिठाने का ज्यादा है। तो मेरे लिए दोनों ही जरूरी  हैं। मैं काम के साथ-साथ अपने परिवार, दोस्तों और संबंधियों के लिए समय निकालती हूं। हमेशा बहुत समय तो नहीं होता, लेकिन कुछ न कुछ एक्साइटिंग  होते रहना चाहिए, उसे हम खोज ही लेते हैं।


आपके करियर का सबसे यादगार लमहा कौन सा है?

मेरे करियर में? (देर तक सोचते हुए)..पद्मश्री अवॉर्ड  मिलना मेरे जीवन का बेहतरीन क्षण था, जिसकी मुझे उम्मीद नहीं थी। यह मुझे, मेरे काम और मेरी कंपनी को बडी पहचान मिलने का समय था। यह सचमुच अनोखा अनुभव था।


जीवन में कोई पछतावा है?

(हंसते हुए) हां, कई सारे हैं। लेकिन हम वहीं खडे नहीं रहते, जीवन के साथ सबको आगे बढना होता है।


आपने इतने समय में बहुत कुछ हासिल किया है। हमारे स्तंभ का नाम है- मैं हूं मेरी पहचान। अपनी पहचान पाना कितना सुकून और संतुष्टि देता है?

..यह संतुष्टि कि आप खुद  को जानते हैं, अपने प्रति ईमानदार हैं, बहुत जरूरी है। इसे समझने में कुछ साल लग सकते हैं। टीनएज  या 20 साल की उम्र में चीजें  तेजी  से बदलती हैं, कुछ भी स्थाई नहीं होता। ऐसा लगता है कि खुद को समझते हैं, लेकिन वास्तव में ऐसा होता नहीं। लेकिन फिर उम्र के साथ-साथ सोच, दृष्टिकोण और स्थितियां बदल जाती हैं। हम आज जो सोच रहे हैं, शायद अगले 20 साल बाद वैसा न सोचें। (हंसते हुए ) क्या मैं सही कह रही हूं?


भाग्य और अध्यात्म पर यकीन करती हैं?

..हां। लेकिन किस्मत के साथ ही कठिन मेहनत पर भी विश्वास करती हूं। आध्यात्मिक भी हूं, लेकिन परंपराओं या प्रथाओं को फॉलो करने के बजाय मैं अपने भीतर के अध्यात्म को मानती हूं।


जो युवा इस इंडस्ट्री में आना चाहते हैं, उनमें क्या क्वॉलिटीज  होनी चाहिए?

हॉस्पिटैलिटी  के फील्ड में भारत तेजी  से विकास कर रहा है। इसमें युवाओं के लिए बहुत संभावनाएं हैं। न सिर्फ रोजगार, बल्कि उन लोगों के लिए भी अवसर हैं जो एंटरप्रेन्योर  के तौर पर इसमें आना चाहते हैं। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि टूरिज्म  इंडस्ट्री भारत में 39 मिलियन  लोगों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार  दे रही है। लेकिन हमारी स्लो इकोनॉमी  के कारण यह प्रतिशत आगे बना रहेगा या नहीं, नहीं कहा जा सकता। मुझे लगता है कि इस इंडस्ट्री में बहुत योग्यता की जरूरत  है। हर तरह के स्किल्स की जरूरत  है यहां। अगर मैं अपनी बात करूं तो हमें क्रिएटिव लोगों की जरूरत होती है।


अच्छा प्रिया, कहते हैं, कस्टमर इज  ऑलवेज  करेक्ट.. क्या आप भी इसमें विश्वास करती हैं?

(जोर  से हंसते हुए)..मुझे नहीं लगता कि हमेशा कस्टमर को पता होता है कि उसे क्या चाहिए। यह मानना भी जरूरी  नहीं है कि वह हमेशा सही है। लेकिन हम ऐसे बिजनेस  में हैं, जहां उसकी संतुष्टि ही हमारा उद्देश्य है। इसलिए हमें उसकी पॉजिशन को बनाए रखना होता है..और यह सुनिश्चित करना होता है कि वह शांत-संतुष्ट होकर लौटे।


इससे जुडे कोई मजेदार अनुभव बांटना चाहेंगी?

हमारे पास कई ऐसे लोग आते हैं। हमारे सीईओज के पास रोज सैकडों कमेंट्स आते हैं। उनमें से कुछ मेरे पास भी आते हैं। कस्टमर इंटरैक्शन कई चीजों पर निर्भर कर सकता है। लाइटिंग, सर्विस में कमी, अटेंशन में कमी..कई शिकायतें होती हैं। हम समझते हैं चीजों को, लेकिन मेरा काम उनकी हर शिकायत को गंभीरता से लेना है। अगर कस्टमर शिकायत कर रहा है तो उसे समझदारी व संवेदनशीलता से सुनें, इसी से 90  फीसद समस्याएं सुलझ जाती हैं..। हमारा बिजनेस यही है कि यहां से हर व्यक्ति संतुष्ट होकर जाए। उन्हें लगे कि वे किसी के पास गए और उनकी शिकायत सुनी गई। हमारे होटल्स से लोग अच्छे अनुभव लेकर जाते हैं। पर हर किसी को संतुष्ट नहीं किया जा सकता। फिर भी यह सर्विस इंडस्ट्री है, लोगों की चीज है। एयरलाइन, हॉस्पिटैलिटी, बैंकिंग ऐसी तमाम इंडस्ट्री में मेकैनिकल होकर नहीं रहा जा सकता। कोशिश हो कि शिकायतें कम की जाएं..।


एक आखिरी सवाल..। क्या भविष्य में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आपके होटल्स  नजर  आएंगे?

अगले 5-7  साल में ऐसा होगा। अभी हमारे पास ऐसी 12 प्रॉपर्टीज  हैं, जिनमें हमारी ओनरशिप  और मैनेजमेंट हैं। पार्क के तीन और ब्रैंड लॉन्च कर रहे हैं। और भी बहुत कुछ है..। इसके अलावा इंटरनेशनल डेस्टिनेशंस  में भी पार्क होटल्स  बनाने की योजना है..।




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