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जब वे एक तवायफ से मिलने गए...

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देश के विभाजन के संदर्भ में मुसलमान किरदारों को लेकर बनी गर्म हवा दो तरह से विशेष फिल्म बनती है। पहली बार हिंदी फिल्म में मुस्लिम किरदार वास्तविक दिखते हैं। आमतौर पर मुसलमानों को अलग रूप-रंग में पेश किया जाता रहा है। या तो वे मुगल-कालीन कहानियों के हीरो होते थे या पर्दा और शेरो-शायरी में मस्त रहते थे। निर्देशक एम. एस. सथ्यू बताते हैं, हिंदी में मुसलमानों पर अनेक फिल्में बनी हैं, लेकिन गर्म हवा में पहली बार वे वास्तविक दिखे। वे पाकीजा और मेरे महबूब जैसी फिल्मों के किरदार नहीं थे। यहां लोग शायरी नहीं करते और न नवाबों के नकली तौर-तरीके हैं। सच्ची कहानी व सच्चे किरदार हैं। गर्म हवा की दूसरी विशेषता विभाजन का संदर्भ है। फिल्मों में विभाजन की चर्चा छिटपुट रूप से हुई है। फिल्मकारों ने इसे मुख्य विषय नहीं बनाया। आजादी के करीब 25 साल बाद एम. एस. सथ्यू ने यह कोशिश की। फिल्म आगरा के मिर्जा परिवार पर केंद्रित है।

garam hawaढाई लाख का बजट

सथ्यू कहते हैं, अच्छी फिल्में इत्तफाक से बनती हैं, जबकि बुरी फिल्में हमेशा बनती रहती हैं। गर्म हवा को एफएफसी ने फाइनेंस किया। इसे आज हम एनएफडीसी के नाम से जानते हैं। तब उसके अध्यक्ष करंजिया थे। मैंने उन्हें स्क्रिप्ट दी, पर उन्होंने मना कर दिया। उन्होंने दूसरी स्क्रिप्ट मांगी तो मुझे इस स्क्रिप्ट का खयाल आया। शमा जैदी ने इस्मत चुगताई से यह कहानी सुनी थी। शमा जैदी ने उसे ही स्क्रिप्ट का रूप दिया था। करंजिया को स्क्रिप्ट अच्छी लगी। उन्होंने ढाई लाख रुपये देने का वादा किया। एफएफसी इतना सहयोग ही कर सकती थी।


इन दिनों इंडी (स्वतंत्र) सिनेमा की चर्चा है। ऐसी फिल्में निर्माता-निर्देशकों की स्वतंत्र कोशिशों से बनती हैं। कॉर्पोरेट कंपनियां या स्थापित प्रोडक्शन हाउस के सहयोग के बिना बनी ऐसी फिल्में विषय व मेकिंग की दृष्टि से साहसी प्रयास करती हैं। मल्टीप्लेक्स संस्कृति के बाद ऐसी छोटी, स्वतंत्र, मुखर व संवेदनशील फिल्मों को थिएटर मिलने लगे हैं। लेकिन वर्ष 1973 में ऐसा संभव नहीं था। यही कारण है कि चर्चित और प्रशंसित हिंदी का समानांतर सिनेमा कंटेंट की खूबियों के बावजूद दर्शकों से वंचित रहा। एम. एस. सथ्यू आगे बताते हैं, हमें सिर्फ दो लाख 49 हजार रुपये मिले। एक हजार की कमी ही रह गई। ये मिल जाते तो थोडी सुविधा हो जाती। उन दिनों 1000 रुपये का भी महत्व था।

कलाकारों की फीस

आज कलाकार लाखों-करोडों लेते हैं। हालांकि महंगाई व मुद्रा अवमूल्यन ने रुपये की कीमत कम की है, फिर भी ढाई लाख का बजट तो तब भी बहुत कम रहा होगा। यह एम. एस. सथ्यू और उनकी टीम की जिद थी कि इतने में फिल्म पूरी की गई। सथ्यू बताते हैं, ज्यादातर लोग इप्टा (इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन) से जुडे थे। हमें एक कैमरा और एक लेंस मिला था। हम लोकेशन पर फिल्म की रिकार्डिग भी नहीं कर सके। इसकी एडिटिंग साइलेंट फिल्म की तरह हुई। बाद में संवाद डब किए गए। तब हिंदी फिल्मों में इप्टा से जुडे कई रंगकर्मी थे। बलराज साहनी और ए.के. हंगल अग्रणी थे। बलराज साहनी को इस फिल्म के लिए 5000 रुपये दिए गए जबकि फारूख शेख को 750 रुपये मिले, वह भी सालों बाद। आगरा के भी अनेक लोग फिल्म से जुडे। उनका बडा सहयोग रहा।


मार्मिक कहानी

गर्म हवा आगरा के मिर्जा परिवार की कहानी है। परिवार में हलीम मिर्जा और सलीम मिर्जा दो भाई हैं। दोनों बूढी मां के साथ एक पुश्तैनी हवेली में रहते हैं। हलीम मुस्लिम लीग के नेता हैं और पुश्तैनी मकान के मालिक भी। सलीम मिर्जा को हिस्से में जूते की फैक्टरी मिली है। सलीम के दो बेटे हैं बाकर और सिकंदर। बाकर फैक्टरी में मदद करते हैं और सिकंदर पढाई खत्म करके रोजगार की तलाश में हैं। एक बेटी अमीना है, जो अपने चचेरे भाई कासिम से मोहब्बत करती है। हलीम अपने बेटे कासिम को लेकर पाकिस्तान चले जाते हैं। विभाजन की वजह से उनकी मोहब्बत परवान नहीं चढती। फिर अमीना फुफेरे भाई शमशाद से मोहब्बत करने लगती है।


शमशाद से भी उसे धोखा मिलता है। इधर सलीम मिर्जा की फैक्टरी की हालत बिगडती जा रही है। उन पर जासूसी का आरोप लगता है। इस कारण उन्हें जरूरी कर्ज नहीं मिल पाता। बेटी अमीना गमजदा होकर आत्महत्या कर लेती है। आखिरकार सलीम मिर्जा पाकिस्तान जाने का फैसला करते हैं, लेकिन आखिरी मौके पर बेटे सिकंदर से प्रेरित होकर वे मुख्यधारा में मिलने का फैसला करते हैं। बीवी को घर भेज कर वह बेटे के साथ जुलूस में शामिल हो जाते हैं।

कैफी आजमी की आवाज उभरती है-

जो दूर से करते हैं तूफान का नजारा

उनके लिए तूफान वहां भी है-यहां भी

धारा में मिल जाओ तो बन जाओगे धारा वक्त का ऐलान वहां भी है-यहां भी..

फिल्म की थीम यही है। सथ्यू इसी पर जोर देते हैं, विभाजन के बाद देश जिस त्रासदी से गुजरा, उसे सिर्फ धर्म के रिश्ते से नहीं देखा जा सकता। इसमें सभी जाति, समुदाय और धर्म के लोगों का नुकसान हुआ। फिल्म में सलीम मिर्जा के जरिये यही संदेश दिया गया है कि सभी मुख्यधारा का हिस्सा बनें। अल्पसंख्यकों को अल्पसंख्यक की तरह न देखें। वे भी मुख्यधारा के हिस्से हैं। जो लोग धार्मिक चश्मे से विभाजन को देखते हैं, वे सही निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकते। फिल्म के शुरू और अंत में कैफी आजमी ने दोनों देशों के हालात पर मौजूं अभिव्यक्ति दी है।


नफरतों के बीच मोहब्बत विभाजन की विभीषिका से देश कभी निकल नहीं सका। हाल-फिलहाल हुए दंगे समाज में व्याप्त पारंपरिक शक को ही रेखांकित करते हैं। दोनों देशों में ऐसी सोच उभर रही है कि देश का विभाजन व्यर्थ हुआ। कहीं-कहीं हमारे नेताओं के अहं व जल्दबाजी के नतीजे के रूप में विभाजन सामने आया। सत्ता हथियाने की होड में नेताओं ने लाखों नागरिकों को बेघर और लाचार कर दिया। इस स्तर का माइग्रेशन पूरे विश्व में नहीं दिखता। परिवार टूटे, देश छूटा। दशकों बाद भी टीस बची है। गर्म हवा में हम देखते हैं कि कैसे देश टूटने से परिवार टूटता है। परिवार टूटने से रिश्ते और मोहब्बत में भी फांस आती है।


फिल्मों में इस दर्द को नजरअंदाज किया गया। हिंदी व बंगाली साहित्य में विभाजन की पृष्ठभूमि पर साहित्य रचा गया, लेकिन फिल्मों में दूरी बनी रही। विभाजन के बाद देश के कई मुसलमानों ने पुरखों की जमीन नहीं छोडी। उन्होंने यहीं रहने का राजनीतिक फैसला लिया। बाद में उनकी वफादारी पर शक किया गया। तर्क दिया जाता रहा है कि मुस्लिम लीग के नेताओं की मांग पर पाकिस्तान बन गया तो सारे मुसलमान पाकिस्तान क्यों नहीं चले गए? देश में रह रहे मुसलमानों के सवाल का जवाब देने के लिए कोई तैयार नहीं था। वे पूछते हैं, हमने तो पाकिस्तान नहीं मांगा, फिर हम पर शक क्यों? गर्म हवा में सलीम मिर्जा पूछते हैं, जो भागे हैं, उनकी सजा उन्हें क्यों दी जा रही है, जो न भागे हैं और न भागेंगे।


बूढी मां का किरदार

फिल्म में बूढी मां के किरदार से सभी को सहानुभूति होती है। वह हवेली छोडने को तैयार नहीं हैं। हवेली खाली करने की नौबत आती है तो वह एक कोने में छिप जाती हैं। सलीम मिर्जा के साथ शिफ्ट होने के बाद भी उनकी सांस हवेली में ही अटकी रहती है। आखिरी वक्त में उन्हें हवेली में लाया जाता है, जहां वह अंतिम सांस लेती हैं। बूढी मां का रोचक किरदार बेगम अख्तर निभाने वाली थीं। सथ्यू बताते हैं, लेकिन उनके शौहर नहीं चाहते थे कि वह फिल्मों में काम करें। दूसरी ओर बलराज साहनी ने यह पूछ कर तंग कर दिया कि मेरी मां कहां है? तब मैंने हवेली के मालिक माथुर साहब का सहारा लिया। उन्होंने कभी जिक्र किया था कि उनकी हवेली के आंगन में तवायफों के नाच हुआ करते थे। एक दिन वे एक तवायफ से मिलने गए। मिलने की रोचक घटना का सार था कि वह तवायफ 16 साल की उम्र में हीरोइन बनने मुंबई आई थीं और फिर निराश लौटी थीं। उम्र गुजर जाने के बाद उन्हें फिल्म का प्रस्ताव घर की दहलीज पर मिला।

जिंदगी जैसी फिल्म

सथ्यू पलकें बंद कर याद करते हुए रहस्य खोलते हैं, सच कहूं तो मैं बलराज साहनी के प्रति क्रूर रहा। इस फिल्म में उनकी बेटी अमीना आत्महत्या कर लेती है। मैंने उनसे कहा कि उनकी आंखों में आंसू नहीं आने चाहिए और न वे कुछ बोलेंगे। ठीक ऐसा प्रसंग उनकी निजी जिंदगी में घट चुका था। उनकी बेटी शबनम ने आत्महत्या कर ली थी तो बलराज साहनी की प्रतिक्रिया फिल्म जैसी ही थी। वह प्रतिक्रिया फिल्म के किरदार, उसके स्वभाव व अभिनय शैली के मेल में थी, इसलिए मैंने संकेत से उसे ही दोहराने को कहा। यह उनका ही प्रभाव था जो अन्य कलाकारों ने भी प्रचलित ओवर-एक्टिंग व मेलोड्रामा की शैली छोड दी।


अफसोस की बात है कि इस फिल्म के लिए बलराज साहनी को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार इस आधार पर नहीं दिया गया कि उनकी मृत्यु हो चुकी है। इसके पहले भी फिल्म दो बीघा जमीन में श्रेष्ठ अभिनय के बावजूद उन्हें इस पुरस्कार से इसलिए दूर रखा गया कि वे कम्युनिस्ट थे और पार्टी के कार्ड होल्डर रह चुके थे।




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Indian के द्वारा
June 9, 2016

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