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खुशियां किस्तों में क्यों ?

Posted On: 21 Apr, 2013 मेट्रो लाइफ में

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एक रेस्टरां के बाहर लगे बोर्ड पर लिखा था-जी भरकर खाएं, बिल आपका पोता देगा, यह देखकर एक व्यक्ति ने अपनी मनपसंद चीजों का आर्डर दिया और खाने के बाद जब वह बाहर जाने के लिए उठने लगा तो वेटर ने उसके सामने बिल लाकर रख दिया। उसने अचरज से पूछा, यह क्या है? वेटर ने शालीनता से कहा, आपके दादा जी का बिल!कर्ज से मिली सुविधा के उपभोग और िकस्तों में उसके भुगतान का मामला भी कुछ इस लतीफे जैसा ही है।


किस्तों का साथ

फिर भी लोग धडल्ले से लोन ले रहे हैं। इसके सिवा उनके पास कोई दूसरा चारा भी तो नहीं है। आख्िार आज के युवाओं को करियर के शुरुआती वर्षो में ही वेल फर्निश्ड घर, कार और आरामदायक लाइफस्टाइल जो चाहिए। इस संबंध में एक मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत पंकज शर्मा कहते हैं, आज 27 वर्ष की उम्र में मेरी गृहस्थी अच्छी तरह सेट हो गई है। हमने मिलकर होम लोन लिया है। हम दोनों की सेलरी से प्रतिमाह बीस-बीस हजार रुपये की ईएमआइ (इक्वेटेड मंथली इंस्टॉलमेंट) कटती है। इससे हमें इन्कम टैक्स में भी छूट मिल जाती है।

संतोषम् परमम् सुखम्?


कर्ज अपने साथ मुसीबतें लेकर आता है। उधार प्रेम की कैंची है। आज नकद, कल उधार, संतोषम् परमम् सुखम्, चादर देखकर पैर फैलाने की कोशिश करनी चाहिए..न जाने ऐसी कितनी ही कहावतें भारतीय जनमानस में सदियों से रची-बसी हैं। अब तक हमारी संस्कृति में उधार और दिखावे की प्रवृत्ति गलत समझी जाती रही है, पर आज पूरा परिदृश्य बदल गया है। बैंक कहने लगे हैं कि हमें आपका ख्ायाल है तभी तो आपको आसान िकस्तों पर कर्ज देते हैं। सारी कंपनियां ग्राहकों को बुला-बुलाकर कह रही हैं, नकद की चिंता छोडो आज ही उधार ले जाओ, वो भी बिना किसी ब्याज के। अगर चादर छोटी है तो डरो मत, पहले पैर तो फैलाओ बडी चादर भी आ जाएगी। बाजारवाद नए जमाने के उपभोक्ताओं से कह रहा है, पहले अपने बच्चों को ख्ार्च करना सिखाओ, कमाना उन्हें अपने आप आ जाएगा। अब तक यही माना जाता था कि कर्ज लेना मजबूरी और शर्म की बात है, पर कर्ज-उधार अब मजबूरी नहीं, बल्कि जरूरत बन चुका है। कर्ज लेने वाले शरमाते नहीं, बल्कि लोगों को गर्व से बताते हैं, मेरी तो 50-50 हजार की दो-दो ईएमआइ चल रही है। अब लोन से लोगों की हैसियत आंकी जाती है, जितना बडा कर्जदार उतना मालदार। बैंक भी लोगों की आमदनी का जरिया और उनकी लोन चुकाने की क्षमता को देखकर ही लोन देते हैं। क्या आज के दौर में आप संतोषम् परमम् सुखम् के दर्शन पर यकीन रखते हैं ? यह पूछने पर एक मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत नितिन गर्ग कहते हैं, कतई नहीं। जिस दिन हम इस दर्शन को अपनाएंगे उसी दिन से हमारे लिए विकास के सारे रास्ते बंद हो जाएंगे। जो है, जितना है उसी में ख्ाुश रहने वाला इंसान जीवन को बेहतर बनाने की कोशिशें बंद कर देता है। अपने पास जितना है उससे कुछ और ज्यादा पाने लालसा हर इंसान के दिल में होनी चाहिए। तभी वह ज्यादा मेहनत कर पाएगा। संतोषम् परमम् सुखम् का सिद्धांत संतों के लिए तो ठीक हो सकता है, पर हमारे जैसे सांसारिक लोगों का इससे गुजारा नहीं चलने वाला। हमारी आमदनी सीमित है और ख्ार्च बहुत ज्यादा। रोजमर्रा की जरूरत की चीजों की कीमतें आसमान छू रही हैं। उन्हें हम किसी तरह कतर-ब्योंत करके पूरी कर लेते हैं, लेकिन जब हमें अपने घर के लिए फ्रिज या एसी जैसा कोई बडा सामान खरीदना हो तो उसके लिए हमारे पास पैसे कहां से आएंगे? ऐसे में िकस्तों पर चीजें खरीदना ही एकमात्र विकल्प रह जाता है।


आदत पड गई है अब

िकस्तों पर प्रॉपर्टी, कार या दूसरे महंगे घरेलू उपकरण ख्ारीदना कुछ लोगों को इस दृष्टि से भी फायदेमंद लगता है कि एक बार में किसी महंगे सामान का पेमेंट करने से पूरे महीने का बजट हिल जाता है, लेकिन हर महीने छोटी-छोटी िकस्तों में भुगतान करने पर अगर हमें सौ रुपये की किसी चीज के लिए डेढ सौ रुपये भी चुकाने पडे तो खलता नहीं है। संदीप पेशे से आर्किटेक्ट हैं। वह कहते हैं, मैं बहुत सोच-समझकर क्रेडिट कार्ड से चीजें ख्ारीदता हूं और सही समय पर उनका भुगतान कर देता हूं। मुझे इससे आज तक कोई समस्या नहीं हुई। जब लोग बिना सोच-समझे क्रेडिट कार्ड का बेहिसाब इस्तेमाल करके भुगतान में देर करते हैं तो बाद में उन्हें फाइन सहित पेमेंट करना पडता है। फिर ऐसे में वे क्रेडिट कार्ड को दोष देते हैं। मैंने कार से लेकर कैमरा तक सारी चीजें ईएमआइ की जरिये ही ख्ारीदी हैं। जैसे ही किसी एक चीज की िकस्तें कटनी बंद हो जाती हैं। मैं किस्तों पर कोई दूसरी नई चीज उठा लाता हूं। ईएमआइ बिलकुल नए जूते की तरह होता है जो, शुरुआत में थोडी तकलीफ जरूर देता है पर बाद में हमें इसकी आदत पड जाती है।


दिल मांगे और

देश में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आगमन के बाद आकर्षक सेलरी पैकेज से युवा वर्ग की परचेजिंग पावर अचानक बढ गई है। जब हाथों में पैसे हों तो उन्हें ख्ार्च करने की व्यग्रता भी बढ जाती है। आज अपने देश में हर तरह के विदेशी ब्रैंड मौजूद हैं। शो विंडो में सजी चीजें देखकर मन ललचाए और जेब में कैश न हो तो घबराना कैसा? नकद पैसे देकर चीजें ख्ारीदना या किसी रेस्टरां का बिल चुकाना अब आउट ऑफ फैशन हो गया है। डेबिट कार्ड से बिल चुकाएं, अगर अभी अकाउंट में पैसे न हों तब भी चिंता किस बात की? क्रेडिट कार्ड जिंदाबाद। बाजार ने युवा वर्ग की यह नब्ज पकड ली है। अब बाजार वाद का एकमात्र नारा है-जरूरत न हो तो भी युवाओं के लिए रोज नई जरूरतें पैदा करो। शॉपिंग उनका प्रिय शगल बन चुका है। बस, उन्हें रिझाते रहो। वे ख्ाुद-ब-ख्ाुद तुम्हारी चंगुल में आकर फंसेंगे। इसी समस्या पर कुछ साल पहले एक फिल्म बनी थी- ईएमआइ। जिसमें संजय दत्त ने एक रिकवरी एजेंट सत्तार भाई की भूमिका निभाई थी। उनका यह डायलॉग बडा चर्चित हुआ था, लोन लिया है तो चुकाओ, शादी की है तो निभाओ, इस फिल्म में ईएमआइ की वजह से आने वाली मुश्किलों का सटीक विश्लेषण किया गया था।


हम किसी से कम नहीं

अब सवाल यह उठता है कि आख्िार पिछले दस-पंद्रह वर्षो में ऐसी क्या बात हुई, जिसकी वजह से लोग अंधाधुंध ख्ार्च करने लगे। इसके जवाब में आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ डॉ. एस. सी. शर्मा कहते हैं, अर्थशास्त्र में इसे डेमॉन्स्ट्रेशन इफेक्ट कहा जाता है। अगर सरल शब्दों में कहा जाए तो अब लोग अपना रूखा-सूखा खा कर ठंडा पानी पीने वाले दर्शन में यकीन नहीं रखते। अब वे दूसरों की घी चुपडी रोटी देखकर सिर्फ ललचाते ही नहीं, बल्कि उसे पाने के लिए जी-जान लगा देते हैं। यही प्रवृत्ति लोगों को बेवजह ज्यादा ख्ार्च करने के लिए प्रेरित कर रही है। बाजार से चीजें ज्यादा ख्ारीदी जा रही हैं। इसे हम अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत मान सकते हैं, पर लंबे समय में इंसान पर इसका नकारात्मक असर पडेगा। उधार का चस्का बहुत बुरा होता है। शुरुआत में तो यह मजा देता है, पर बाद में सजा बन जाता है। बिजनेस क्लास की बात और होती है, उनके बिजनेस में उधार का हिसाब-िकताब अलग ढंग से चलता है। उनका उधार किसी दूरगामी फायदे के लिए होता है, लेकिन जब सीमित आय वाला नौकरीपेशा व्यक्ति क्रेडिट कार्ड से बेतहाशा महंगी ब्रैंडेड चीजों की शॉपिंग करे तो यह उसके लिए घातक साबित होगा। अमेरिका की अर्थव्यवस्था इसका सबसे बडा उदाहरण है। वहां के बैंकों ने लोगों में उधार की प्रवृत्ति को बढावा देने के लिए मिनिमम मार्जिन मनी की सीमा हटा कर चीजों के लिए शत-प्रतिशत फाइनेंसिंग शुरू कर दी। नतीजा यह हुआ कि लोगों ने बिना सोचे-समझे ख्ाूब लोन ले लिया। फिर मंदी के दौर में जब नौकरियां जाने लगीं तो बेहद भयावह स्थिति पैदा हो गई। वहां कर्ज की वजह से डिप्रेशन और आत्महत्या के मामले तेजी से बढने लगे।


नींद बेच कर ख्ारीदी खाट

जब सब कुछ ज्यादा और जल्दी चाहिए तो हमें उसकी कीमत भी उसी हिसाब से चुकानी पडेगी। एक विज्ञापन एजेंसी में कार्यरत रश्मि रावत कहती हैं, हमारी शादी को तीन साल हो चुके हैं, लेकिन फ्लैट और कार की ईएमआइ की वजह से हम अभी तक बच्चे के बारे में सोच नहीं पा रहे। हमारे आने-जाने का कोई समय निश्चित नहीं है। एक ही घर में रहते हुए हमें एक-दूसरे से बातें करने का भी वक्त नहीं मिलता और जब बात होती है तो झगडा ही हो जाता है। मेरे पति 28 साल की उम्र में ही हाई ब्लडप्रेशर के मरीज बन चुके हैं। अपने घर में सुकून से रहने के लिए इतनी मेहनत करके हमने सारी सुविधाएं जुटाई, आज हमारे पास सब कुछ है, पर मन का चैन नहीं है। ऐसा लगता है कि हम सिर्फ कर्ज चुकाने के लिए जी रहे हैं। हमारी हालत नींद बेच कर खाट ख्ारीदने वाले इंसान जैसी हो गई है।


रिश्तों में बढती दूरियां

पैसा इंसान की जरूरतें पूरी करने के लिए होता है, लेकिन जब इंसान सब कुछ भूलकर स्वयं को पैसे का गुलाम बना ले तो यह गुलामी उसका आत्मविश्वास कमजोर कर देती है। मनोवैज्ञानिक सलाहकार डॉ. अशुम गुप्ता कहती हैं, ईएमआइ कल्चर लोगों को तेजी से वर्कोहॉलिक बना रहा है। कर्ज चुकाने के लिए किसी भी तरह ज्यादा पैसे कमाने की होड लोगों को इतना थका देती है कि इससे उनके व्यवहार में चिडचिडेपन के साथ शारीरिक स्वास्थ्य में भी गिरावट आ रही है। युवा दंपतियों की सेक्स लाइफ खत्म होती जा रही है। पहले दंपतियों के जीवन में माता-पिता और रिश्तेदारों के हस्तक्षेप के कारण समस्या आती थी, पर अब अति व्यस्तता की वजह से रिश्तों में तनाव बढ रहा है।


दिशाहीन मध्यवर्ग

मध्यवर्ग किसी भी समाज की दिशा निर्धारित करने में अहम भूमिका निभाता है, क्योंकि इससे नीचे वाला तबका इसी की जीवनशैली का अनुसरण करता है। समाजशास्त्री डॉ. ऋतु सारस्वत कहती हैं, आज कम आय वर्ग वाले लोग भी अपने ऊपर हैसियत से बढ कर चीजें ख्ारीदने का दबाव महसूस करने लगे हैं। यह दबाव इंसान को कमजोर बना कर उसे गैरजरूरी समझौतों और भ्रष्टाचार की ओर ले जा रहा है। कर्ज दीमक की तरह समाज को खोखला कर रहा है। इसलिए अब इस आदत पर लगाम लगाना जरूरी है।


तब भी पूरी होती थीं •ारूरतें

पुराने जमाने के लोग तो कर्ज के नाम से भी घबराते हैं। इस संबंध में अवकाश प्राप्त आइएएस अधिकारी राजेंद्र शर्मा कहते हैं, पहले कम वेतन में भी बिना किसी कर्ज-उधार के लोगों की सारी जरूरतें पूरी होती ही थीं। पत्नी ने बडी िकफायत से एक-एक पैसा बचा कर गृहस्थी चलाई। तब मैं अपने दो बेटों को डॉक्टर बना पाया और बेटियों की शादी की, पर एक पैसा भी कर्ज नहीं लिया। आज जब मैं अपने बेटों को एक साथ दो-तीन चीजों की िकस्तें चुकाते देखता हूं तो मुझे बहुत चिंता होती है। निजी कंपनियों की नौकरियों का कोई भरोसा नहीं होता। अगर उन्हें थोडे समय के लिए भी बिना जॉब के रहना पडे तो वे अपनी चीजें कैसे मैनेज करेंगे? मैं उन्हें समझाने की कोशिश करता हूं तो वे हंस कर टाल देते हैं। ..लेकिन हंस कर टाल देना किसी समस्या का समाधान नहीं है। अब हमें बेतहाशा ख्ार्च करने की आदतों को नियंत्रित करने और ईएमआइ की सुविधा के संतुलित इस्तेमाल करने पर विचार करना चाहिए। अन्यथा, हम भी अपनी आने वाली पीढियों पर बहुत बडा कर्ज छोड जाएंगे।




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