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उफ..उफ.. ये मिर्चीले रिश्ते

Posted On: 25 Mar, 2013 मेट्रो लाइफ में

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इतने दिनों से कहां थी. एक फोन नहीं कर सकती..बिलकुल बदल गई हो..तुम्हें तो मेरी जरा भी परवाह नहीं..। लोगों की सामान्य बातचीत में ऐसे जुमले हमें अकसर सुनने को मिलते हैं। कभी-कभी ऐसी बातें सुनकर दूसरों को यह भ्रम हो जाता है कि दो लोग झगड रहे हैं, पर वास्तव में ऐसा होता नहीं है। सच पूछा जाए तो हमें सबसे ज्यादा  उम्मीदें अपनों से होती हैं। अगर कोई करीबी हमारी उम्मीदों की कसौटी पर खरा नहीं उतरता तो हम पूरे हक से उसके सामने नाराजगी का इजहार करते हैं। जब रिश्ता अपनापन भरा हो तो उसमें औपचारिकता और शिष्टाचार जैसी बातों के लिए कोई जगह नहीं होती। हमें अपनों के सामने दिल का गुबार निकालने में कोई गुरेज नहीं होता। कुछ रिश्तों में इतनी साफगोई होती है कि हम दूसरों से वही बोलते हैं, जो हमें सचमुच महसूस होता है। भले ही बोलते वक्त हमारी बातों में मिर्च जैसा तीखापन हो, पर उसमें झूठ के मिठास की जरा भी मिलावट नहीं होती। पारिवारिक जीवन में भी कुछ ऐसे रिश्ते होते हैं, जिनमें कोई दुराव-छिपाव नहीं होता, पर लोगों के बीच गिले-शिकवे की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है। आइए एक नजर डालते हैं, कुछ ऐसे ही रिश्तों पर

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खींचतान पति-पत्नी के बीच

पति-पत्नी का रिश्ता ऐसा होता है, जिसमें दो व्यक्ति एक-दूसरे के साथ सबसे ज्यादा सहज होते हैं। जहां सहजता होती है, वहां वैचारिक मतभेद और तकरार स्वाभाविक है। मैरिज काउंसलर डॉ. अनु गोयल कहती हैं, पति-पत्नी के रिश्ते में काफी पारदर्शिता होती है। इसलिए एक-दूसरे से कुछ शिकायतें होना स्वाभाविक है। ऐसे में दोनों के बीच थोडी-बहुत नोकझोंक स्वस्थ रिश्ते की पहचान है। अपने साथी के लिए मन में ढेर सारी शिकायतें दबा कर रखना, पर कुछ भी न कहना इस रिश्ते के लिए सबसे ज्यादा नुकसानदेह होता है। इसलिए अगर पार्टनर की कोई बात पसंद न आए तो उसके सामने अपनी नापसंद जाहिर करने में जरा भी झिझक नहीं होनी चाहिए।


बहू जब बनती है सास

सास-बहू का रिश्ता तो सदियों से मिर्च जैसे तीखेपन के लिए मशहूर रहा है। जब नई बहू घर में आती है तो वहां का माहौल उसके लिए बिलकुल अजनबी होता है, जिसमें वह खुद  को ढालने की जी जान से कोशिश करती है, पर कई बार पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाती। दूसरी ओर सास है, जो अब तक घर को अपने ढंग से चलाती थी, नए सदस्य के आगमन के बाद वह खुद को असुरक्षित महसूस करती है। उसे ऐसा लगता है कि बहू के आने से कहीं उसके हाथों से गृहस्थी की बागडोर छिन न जाए। सबसे बडी बात यह है कि कोई भी स्त्री सास बनने से पहले मां होती है। बेटे पर वह अपना सारा प्यार लुटाती है और इसी प्यार के नाते वह उस पर सिर्फ अपना अधिकार समझती है। ऐसे में बेटे की शादी के बाद मां को सबसे ज्यादा दुख इसी बात से होता है कि अब उसका प्यार बांटने के लिए घर में बहू भी आ गई है। इन्हीं वजहों से सास-बहू के रिश्ते में मतभेद दिखाई देने लगता है। इस संबंध में मनोवैज्ञानिक सलाहकार डॉ. अशुम गुप्ता कहती हैं, यह रिश्ता बेहद नाजुक होता है। इसमें जहां एक ओर दो पीढियों की सोच का टकराव होता है, वहीं दो स्त्रियां अपने अधिकारों और पर्सनल स्पेस को लेकर बहुत ज्यादा सजग होती हैं। इसीलिए ऐसे रिश्ते में थोडी-बहुत खींचतान हमेशा चलती रहती है। ऐसे में अगर दोनों एक-दूसरे की मन:स्थिति समझते हुए अपने व्यवहार में शालीनता बरतें तो रिश्ते में मधुरता बनी रहेगी।

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देवरानी बनाम जेठानी

जब एक ही घर-आंगन में अलग-अलग परिवारों से दो लडकियां बहू बन कर आती हैं तो उन्हें पूरे परिवार के अलावा एक-दूसरे के साथ भी एडजस्ट  करना होता है। यह उनके लिए बेहद मुश्किल काम है क्योंकि वरीयता क्रम में भले ही एक बहू दूसरे से बडी हो, पर ससुराल में दोनों की स्थिति लगभग समान होती है। इसलिए परिवार की बहुओं के बीच खुद  को सबसे अच्छी बहू साबित करने की होड सी लगी रहती है। ऐसे में उनके बीच राइवलरी  की भावना सहज रूप से विकसित होने लगती है। उसकी साडी, मेरी साडी से सफेद कैसे वाली फीलिंग  उनके रिश्ते में अकसर देखने को मिलती है। इस संबंध में डॉ. अशुम  गुप्ता आगे कहती हैं, ऐसे रिश्ते में अकसर स्त्रियां अपने बच्चों, पति या आर्थिक स्थिति की तुलना करती हैं। अगर कभी उन्हें अपना परिवार देवरानी या जेठानी के परिवार से जरा सा भी कमतर दिखाई देता है तो इस बात को लेकर उनके मन में हीन भावना या ईष्र्या पनपने लगती है, पर इसका अर्थ यह नहीं है कि इस रिश्ते में प्यार नहीं होता। उनमें बहनों की तरह प्रतिस्पर्धा के साथ प्यार भी होता है। अगर उन्हें बुजुर्गो का सही मार्गदर्शन मिले। तो ऐसी नकारात्मक भावनाएं ज्यादा देर तक टिक नहीं पातीं।


ननद-भाभी की नोकझोंक

यह रिश्ता भी बेहद नाजुक होता है क्योंकि इसमें कोई लडकी किसी नए परिवार में बहू बनकर आती है, वहीं दूसरी ओर कोई बेटी वहां पहले से रह रही होती है। भाभी को देखते ही उसके मन में सबसे पहला खयाल यही आता है कि अब मेरे सभी अधिकारों में भाभी की भी शेयरिंग होगी। वहीं भाभी सोचती है कि ननद कहीं मुझ पर हावी होने की कोशिश न करे। ऐसे में थोडी नोकझोंक तो होगी ही। भारतीय समाज में ऐसे रिश्तों के बीच हंसी-मजाक की छूट होती है। लिहाजा ननद-भाभी के बीच प्यार भरी मीठी नोकझोंक चलती रहती है। हंसते हुए वे एक-दूसरे तक अपनी सारी शिकायतें बडी सहजता से पहुंचा देती हैं। कभी-कभी वे व्यंग्य भरी भाषा में एक-दूसरे की खिंचाई भी करती हैं, पर कोई भी बुरा नहीं मानता। ऐसी बातों को अकसर मजाक समझ कर टाल दिया जाता है और तकरार के बीच भी रिश्ते की मधुरता बनी रहती है।

बिना तीखेपन के रिश्ते निभाने का मजा नहीं आता। जो रिश्ता जितना सच्चा होता है, उसमें उतना ही तीखापन होता है। दोस्ती इसका सबसे जीवंत उदाहरण है। जरा सोचिए अगर डाइनिंग टेबल  पर केवल स्वीट  डिशेज हों तो आपको खाना कैसा लगेगा! शायद ज्यादा  मीठेपन  से आप ऊबने लगेंगे। हमारे रिश्तों का मामला भी कुछ ऐसा ही है। अपनों के साथ हलकी-फुलकी नोकझोंक का तीखापन रिश्तों में जीवंतता  बनाए रखता है।

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Tags: family and love, family problems, रिश्ते, प्यार, रिश्ते और प्यार



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