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कबूतर और चूहे में दोस्ती ......

Posted On: 30 Sep, 2012 मेट्रो लाइफ में

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दो मित्र थे- एक कबूतर और एक चूहा। दोनों अपने-अपने समूहों के मुखिया थे। एक बार कबूतर का पूरा झुंड एक बहेलिए के बिछाए जाल में फंस गया। तब उसने अपने साथियों को सुझाव दिया कि सभी एक साथ जोर लगाएं और जाल समेत उड चलें। इस तरह वे जाल समेत उड कर जंगल के दूसरे छोर पर मौजूद चूहे के पास पहुंचे। चूहे ने अपने मित्र को जाल में फंसा देखा तो उसने भी तुरंत अपने सभी साथियों को बुलाया और फटाफट जाल को काट डाला। इस तरह उसने कबूतरों को शिकारी के चंगुल से मुक्त कराया और दुनिया के सामने दोस्ती की बेहतरीन मिसाल पेश की।


पंचतंत्र की यह कहानी मित्रता की शक्ति तो बताती ही है, इससे ज्यादा यह बताती है एकता और उसके जज्बे का असर। जाल में फंसा हर कबूतर अगर अपनी पूरी ताकत न लगाता तो शायद सभी पकडे और मारे जाते।यह उनकी एकता और मित्रता का ही नतीजा है जो वे शिकारी से बच सके। साथ ही, यह कहानी के हर पात्र की दक्षता के समुचित उपयोग का भी असर है। वैसे भारत का पूरा सामाजिक ढांचा ही इस बात का प्रमाण है कि यहां के लोग टीम भावना के महत्व से प्राचीन काल से ही सुपरिचित हैं। इसका प्रमाण हम संयुक्त परिवार की व्यवस्था में साफ तौर पर देख सकते हैं। शायद यही वजह है कि संयुक्त परिवार की जैसी प्रतिष्ठा तथा परिवार के सदस्यों के बीच एक-दूसरे के प्रति जैसी प्रतिबद्धता यहां दिखती है, वैसी कहीं और दिखाई नहीं देती। आज गांवों से लेकर महानगरों तक हम रह भले ही छोटे-छोटे कुनबों में बंटकर रहे हों, पर हमारे समाज में प्रतिष्ठा की बात यही है कि एक कुटुंब में दो-तीन पीढियों के सभी लोग एक छत के नीचे एक साथ रहें। भारतीय इतिहास के मध्यकाल को छोड दें तो शेष समय इसका व्यापक असर सामाजिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में भी देखा जा सकता है।


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परिवार से सरोकार

बीच के चार-पांच सौ वर्षो का इतिहास ऐसा है जब हम दुनिया की दूसरी संस्कृतियों से तो संघर्ष कर ही रहे थे, खुद अपने भीतर भी तमाम अंतर्विरोधों से जूझ रहे थे। इनसे उबरने की प्रक्रिया ही शुरू हुई है आजादी के बाद। अब दुनिया भर की तमाम संस्कृतियों से परिचित होने के बाद हम जिस निष्कर्ष पर पहुंच रहे हैं, वह फिर वही है। सभी अर्थो में गुणवत्तापूर्ण जीवन की संयुक्त परिवार से बेहतर व्यवस्था दूसरी नहीं हो सकती।


इस व्यवस्था की सबसे बडी खूबी यह है कि इसमें परिवार के हर सदस्य को यथोचित स्नेह और सम्मान मिलता है। जरूरी नहीं कि योग्यता, क्षमता और आय की दृष्टि से सभी बराबरी पर हों, लेकिन परिवार में महत्व सबका बराबर होता है। परिवार के बाहर उनका सामाजिक स्तर भी लगभग बराबरी का ही होता है। समान अधिकार और महत्व का यह बोध ही दायित्वों के प्रति भी उनमें समानता का भाव पैदा करता है। समानता का यह भाव ही उनके बीच गहरे लगाव का कारण बनता है, जो अच्छे समय के भरपूर सदुपयोग और बुरे समय से निबटने का पूरा जज्बा देता है। जब इतिहास के परिप्रेक्ष्य में देखा गया कि खास तौर से संकटकालीन स्थितियों से निबटने के लिए तो यह एक लाजवाब जज्बा है तो सबसे पहले इसका प्रयोग दिखा सेनाओं में। फिर क्रांतिकारी समूहों और आंदोलनकारियों में। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जब दुनिया के नए सिरे से निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई तो वही जज्बा उन संगठनों में आया जो समाज के पिछडे वर्गो और क्षेत्रों के उत्थान, कुरीतियों के उन्मूल


व्यावसायिकता में सहकारिता

जल्द ही यह बात दूसरे क्षेत्रों के जिम्मेदार लोग भी समझने लगे और फिर अस्पतालों के ऑपरेशन थियेटर से लेकर इंजीनियरिंग एवं तकनीकी प्रोजेक्ट, वैज्ञानिक अनुसंधानों, फिल्म निर्माण और खेल के मैदानों तक यह जज्बा दिखने लगा। पूरा पारिभाषिक अर्थ देने वाले मुहावरे के तौर पर टीम स्पिरिट शब्द का प्रयोग इसी दौर में शुरू हुआ।


सही पूछिए तो नए दौर में इसे पूरी सार्थकता दी है विभिन्न क्षेत्रों के पेशेवर लोगों ने। यह कहना गलत नहीं होगा कि भूमंडलीकरण के दौर में जिन भारतीय संस्थानों ने अपना वजूद बचाया और लगातार विकास किया, उन्होंने टीम स्पिरिट के दम पर ही किया। जो संस्थान यह मानते रहे कि टीम बनाना और उसमें जज्बा पैदा करना तो केवल फौजी अफसरों का काम है, उन्हें इतिहास बनते देर नहीं लगी।


यह इस जज्बे का असर ही था जिसे देखकर हर क्षेत्र में इसे तेजी से अपनाया गया। अधिकतम संस्थानों में मौजूद हर व्यक्ति की प्रतिभा व क्षमता के पूरे उपयोग की परंपरा शुरू हुई। यह बात समझी गई कि कोई भी व्यक्ति पूरी तरह नाकाबिल नहीं होता और न किसी के बगैर कोई काम ही रुकता है। ईश्वर ने कुछ न कुछ प्रतिभा हर शख्स को दी है, जरूरत उसे सही परिवेश देकर उभारने की है। प्रशिक्षण सत्र व कार्यशालाओं के आयोजन इसी क्रम में शुरू किए गए। मनुष्य को एक संसाधन के रूप में देखने और उसके विकास की प्रक्रिया शुरू हुई। यह अलग बात है कि भारत में अभी भी कई क्षेत्रों की तरह इस क्षेत्र में भी स्त्रियां कम हैं, पर पश्चिम में यह क्षेत्र स्त्रियों की विशेषज्ञता वाला ही माना जाता है। हालांकि यदि टीम भावना की जडें तलाशें तो वह भारतीय संस्कृति में ही दिखाई देंगी। आज भी बडे परिवारों की एकता और उनकी सहकारिता में केंद्रीय भूमिका अकसर किसी स्त्री की ही होती है।


साधारण लोग असाधारण उपलब्धि


इसके पहले कि हम टीम स्पिरिट को परिभाषित करें यह देखना जरूरी है कि टीमवर्क है क्या। अमेरिकी उद्यमी एंड्रयू कार्नेगी के अनुसार, एक साझा उद्देश्य के लिए साथ काम करने की क्षमता ही टीमवर्क है। साथ ही यह व्यक्तियों को संगठनात्मक लक्ष्य हासिल करने के लिए प्रेरित करने का भी नाम है। यह वह ऊर्जा है जो सामान्य व्यक्ति को विशिष्ट लक्ष्य हासिल करने के काबिल बना देती है।


प्रेरणा ही वह तत्व है जिसके लिए टीम का नेता मुख्य रूप से जिम्मेदार होता है। प्रबंधन गुरु प्रमोद बत्रा कहते हैं, नेता की रफ्तार ही पूरी टीम की रफ्तार होती है। नेता अच्छी रफ्तार से काम करे, यानी निश्चित समय में असाधारण लक्ष्य हासिल कर सके, इसके लिए वह टीम के चयन के स्तर से ही सतर्क ता बरतने को जरूरी मानते हैं। श्री बत्रा के अनुसार, जब आप टीम के लिए चयन कर रहे हों तो हमेशा ऐसे लोगों को चुनें जो स्वत: प्रेरणा से संपन्न हों। ऐसे लोगों को अपनी टीम में शामिल करने से बचें जिनमें खुद कुछ करने का जज्बा न हो। क्योंकि तब आपको अपना अधिकतम समय उन्हें प्रेरित करने पर खर्च करना पडेगा और ऐसी स्थिति में नियोजन और गुणवत्ता नियंत्रण का कार्य पीछे छूट जाएगा। इस तरह समय और श्रम के साथ-साथ धन का भी अपव्यय होगा और आपको लक्ष्य हासिल करने में अनावश्यक देर होगी।


व्यक्ति और व्यवस्था


इसका यह मतलब बिलकुल नहीं है कि स्वत: प्रेरित लोगों को बाहरी प्रेरणा की जरूरत बिलकुल नहीं होती। अच्छे लोग अपनी क्षमताओं का पूरा इस्तेमाल करें, इसके लिए उन्हें उचित परिवेश दिए जाने की जरूरत होती है। जैसा कि अमेरिकी बेस्टसेलर लेखक स्टीफेन आर. कॅवे कहते हैं, अगर आप अच्छे लोगों को खराब व्यवस्था में रख दें तो बुरे नतीजे ही मिलेंगे। आखिर जिन पौधों को आप पनपते देखना चाहते हैं, उन्हें पानी तो आपको देना ही होगा। अच्छी व्यवस्था का अर्थ स्पष्ट करते हैं प्रमोद बत्रा, एक अच्छा नेतृत्व वह है जो अपने खराब और कमजोर साथियों को भी सुधार और विकास का पूरा अवसर दे। जिसे यह समझ हो कि हर शख्स का काम करने का अपना तरीका होता है। कोई तेजी से काम करता है तो कोई धीरे-धीरे। कोई काम की गुणवत्ता का ज्यादा खयाल रखता है तो कोई मात्रा का। एक अच्छा टीमलीडर वह है जो काम की प्रकृति के अनुसार उसे करने के लिए सही व्यक्ति का चयन करे। जो खराब काम की आलोचना करे तो शिष्ट ढंग से और अच्छे काम की प्रशंसा के मामले में पूरी तरह उदार हो। जो खराब काम की सजा देते समय सहृदयता और अच्छे काम का पुरस्कार देने में उदारता बरते तथा इस मामले में व्यक्तिनिष्ठ न होकर वस्तुनिष्ठ हो। यह बात हमेशा याद रखें कि सफल हमेशा वही होता है जो खुद अपनी आलोचना सुनने के मामले में धैर्यवान और करने वालों का कद्रदान हो।


टीम पर भरोसा


ऐसा वही कर सकता है जिसे अपनी टीम पर पूरा भरोसा हो और टीम पर भरोसा वही करता है जिसे खुद पर विश्वास हो। इस संदर्भ में अमेरिकी दार्शनिक राल्फ वाल्डो इमर्सन का विचार काबिलेगौर है, लोगों पर भरोसा करें, वे आपके प्रति सत्यनिष्ठ होंगे। उनके प्रति ऐसा बर्ताव करें जैसे वे महान हैं, यकीन करें वे महान लोगों जैसा ही आचरण करेंगे।


श्री बत्रा इस संदर्भ में दुर्याधन-शकुनि और श्रीकृष्ण-अर्जुन का उदाहरण देते हैं, दुर्योधन के सलाहकार शकुनि जैसे चाटुकार थे। राज्य के हित से उनका कोई मतलब नहीं था। उन्हें सिर्फ अपने स्वार्थ साधने थे। इसलिए वे वही कह रहे थे जो दुर्योधन सुनना चाहता था। दूसरी तरफ अर्जुन के सलाहकार श्रीकृष्ण थे, जिनका कोई स्वार्थ नहीं था। वे अर्जुन की झूठी तारीफ करने के बजाय हमेशा उन्हें सही सलाह देते थे। चाहे भले ही उनकी बात अर्जुन को बुरी लगे। नतीजा सबके सामने है।


श्री बत्रा टीम स्पिरिट के मार्ग में तीन तत्वों को बाधक मानते हैं और वे हैं- क्रोध, ईष्र्या और बदले की भावना। कहते हैं, इन भावनाओं से टीम के नेता ही नहीं, सदस्यों को भी बच कर रहना चाहिए। ये भावनाएं किसी बडे जहाज के तले में छेद के समान हैं, जो उसे लक्ष्य तक पहुंचने से बहुत पहले ही डुबा देता है।


इसलिए अगर आप टीम में काम करते हैं या किसी टीम का नेतृत्व करते हैं तो एक जापानी कहावत हमेशा याद रखें, हममें से कोई उतना स्मार्ट नहीं है, जितने हम सब हैं। साथ ही जानें टीमवर्क और टीम स्पिरिट के मसले पर विभिन्न क्षेत्रों की मशहूर हस्तियों के अहम खयालात।


शम्मी कपूर से मिला टीम का जज्बा-अभिनेता आमिर खान


मेरे व्यक्तिगत तथा व्यावसायिक जीवन में वरिष्ठ अभिनेता शम्मी कपूर का महत्वपूर्ण स्थान है। मैं कई कारणों से उनकी इज्जत करता हूं। शम्मी जी मेरे ताऊ जी के पसंदीदा स्टार-एक्टर रह चुके हैं। मैं अपने चाचा नासिर हुसैन के हमेशा करीब रहा हूं। उनकी फिल्म मेकिंग से मैंने काफी कुछ सीखा है और शायद मुझे टीम स्पिरिट के जज्बे से शम्मी जी और नासिर हुसैन साहब ने ही परिचित करवाया। आज जो सितारों के कई ग्रुप्स बन चुके हैं, पर मजाल है कि कभी उनके वक्त ऐसा हो जाता। उनके सेट पर ऐसा नजारा देखने को कभी नहीं मिल सकता था कि सितारे अपने-अपने वैन में बैठे हों। शॉट का वक्त हुआ तो सभी सेट पर ही दिखाई देते थे। वरना वैन से बाहर ही नहीं निकलते थे।

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फिल्म मेकिंग का सबसे बडा हिस्सा है उससे जुडी टीम भावना। फिल्म निर्माण के दौरान यदि निर्माता से लेकर स्पॉटबॉय तक में अपनेपन और टीमवर्क की भावना न हो, तो फिल्म का बनना संभव नहीं होगा। मैंने अपने पिता और चाचा दोनों को बचपन से फिल्में बनाते देखा है। मैं उसी माहौल में बडा हुआ हूं। मेरे जीवन में तारे जमीं पर का निर्माण बहुत बडी और साहसिक घटना थी। आप सभी जानते हैं, मैं इस फिल्म का सिर्फ निर्माता था, पर लेखक अमोल गुप्ते से कुछ व्यावसायिक मतभेद हो जाने के कारण मैं इस फिल्म के निर्देशन के लिए राजी हुआ। बहरहाल, तारे जमीं पर की सफलता का सारा श्रेय मुझे कम और टीम को ज्यादा जाता है-जिसमें अमोल और मेरी पत्नी किरण से लेकर सारे स्पॉट बॉयज, कैमरामैन, शामक दावर की डांस टीम सभी शामिल हैं। हम अपने सेट पर हर कलाकार का जन्मदिन मनाया करते थे। सभी छोटे-बडे कलाकारों की पसंद-नापसंद के बारे में जाना करते थे। 1100 बच्चों को एक साथ महाबलेश्वर ले जाना और उनके साथ शूटिंग करना कोई आसान काम नहीं था। पर हमने यह सब कर लिया, क्योंकि हमारे बीच जबर्दस्त टीम भावना थी।


लोग मुझे मिस्टर परफेक्शनिस्ट कहते हैं, क्योंकि मैं अपनी फिल्म के मामले में समझौते नहीं कर सकता। टीम की बेहतरी के लिए सारी सुविधाएं मुहैया कराता हूं। काम लेता हूं और सबके सुझावों का आदर भी करता हूं। मेरे और मेरी टीम के बीच हमेशा एक कंफर्ट जोन बना रहता है। मेरी टीम के हर सदस्य को अपनी राय पेश करने की खुली इजाजत है। शायद इसीलिए जब मेरे और अमोल गुप्ते के विचार आपस में नहीं मिले तो हमने अलग होना बेहतर समझा। एक इंसान होने के नाते मैं यह मानकर चलता हूं कि मेरे साथ मेरी टीम भी काम करने में गलतियां करेगी। बरसों पहले जब मेरी अभिनीत फिल्म कयामत से कयामत तक बन रही थी, तो फिल्म के हीरो-हीरोइन के रहने की जगह दिखाने के लिए कोई उपयुक्त लोकेशन नजर नहीं आ रहा था। लोकेशन ढूंढने में एक अरसा बीत गया। इस पर मंसूर भाई ने अपने सहयोगियों को झाड लगा दी, जो मुझे बहुत खराब लगा। फिल्म या कोई भी बडा प्रोजेक्ट बनाते समय टीम के लोगों से कई बार नुकसान भी हो जाता है। यह एक सामान्य बात है। इस पर नाराज होना मुनासिब नहीं है। इसलिए टीम में काम करने के लिए संयम भी बहुत जरूरी है। मैं अपने साथियों के साथ घुल-मिल कर काम करने वालों में से हूं। सफलता के श्रेय की हकदार टीम ही होती है, यही सच है।


अकेला चना भाड नहीं फोड सकता- मलाइका अरोडा


पहली तो बात यह कि अब तक मुझे जो कुछ भी मिला है, मैं उससे संतुष्ट हूं और मेरा ऐसा मानना है कि मेरी जो कुछ उपलब्धियां हैं, वह केवल मेरी नहीं हैं। इसमें उन सबका हिस्सा है, जिन्होंने किसी भी तरह उस काम में कोई भूमिका निभाई है। अगर एक आइटम गीत की ही बात लें, तो उसकी सफलता भी अकेले मेरी मेहनत का नतीजा नहीं होती है। जब इसमें मैं परफॉर्म करती हूं तो सबसे पहले तो वहां एक गीतकार के शब्द होते हैं, जो कि उसके आधार हैं। फिर संगीतकार द्वारा रची मधुर धुन होती है, गायक का मस्ती भरा सुर होता है। इसके बाद गाने पर कोरियोग्राफर की मेहनत, ग्रुप डांसर का सहयोग। इन सबसे इतर कैमरामैन, ड्रेस डिजाइनर्स, लाइटमैन के साथ ढेर सारे स्पॉट ब्वायज आदि की मेहनत अलग होती है। तब कहीं जाकर मेरी मेहनत रंग लाती है। अगर इनमें से एक भी व्यक्ति अपनी भूमिका निभाने में किसी तरह की चूक कर जाए तो मेरी मेहनत का क्या होगा? इसी तरह अन्य गतिविधियों- रैंप, विज्ञापन फिल्मों और रिएलिटी शोज में भी कई लोगों के सहयोग होते हैं। इसमें से एक भी घटक अलग अपने काम में लापरवाही करता है तो मेरी मेहनत प्रभावित होती है। मेरा परफॉर्मेस निर्देशक के दिशानिर्देश के अनुसार होता है। मैं जब नृत्य करती हूं तो अपने साथ डांस कर रही अन्य लडकियों से भी मैं सुझाव लेती हूं। किसी रिएलिटी शो में जज की भूमिका निभाती हूं तो जरूरी नहीं कि उनके और मेरे मतों में समान हों, पर सबकी राय जरूर लेती हूं। मेरे लिए स्पॉट ब्वाय भी बहुत महत्वपूर्ण होता है। सेट पर अगर मैं किसी स्पॉट ब्वाय को दुखी या परेशान पाती हूं तो जब तक उसकी वजह नहीं जान लेती मैं काम नहीं कर पाती। इन लोगों का प्यार ही मुझे अच्छा काम करने की प्रेरणा देता है। अकेला चना भाड नहीं फोड सकता। मैं इस कहावत को बहुत शिद्दत से स्वीकार करती हूं खासकर हमारे पेशे में जहां टीम-वर्क के बिना आप कुछ भी करने की सोच भी नहीं सकते।


मुट्ठी में होती है बडी ताकत- आशुतोष गोवारिकर


किसी प्रोजेक्ट पर अगर कोई काम करता है तो उसमें उसके साथियों का भी योगदान होता है। टीम के साथ ही किसी काम को अंजाम दिया जा सकता है। एक हाथ में पांच उंगलियां होती हैं, इनमें अकेली किसी एक उंगली का कोई मतलब नहीं है। भगवान ने ऐसी संरचना की है कि पांचों उंगलियों को मिला दें तो मुट्ठी बन जाती है और मुट्ठी में बडी ताकत होती है। मैं टीम भावना को बहुत अहमियत देता हूं। फिल्म निर्माण के दौरान निर्देशक को कई तरह के लोगों से काम लेना होता है। फिल्म के लिए सबका योगदान मायने रखता है। अगर फिल्म सफल हो जाती है तो उसका श्रेय सबको मिलता है, क्योंकि सबका योगदान होता है। लेकिन फ्लॉप हो जाती है तो दोष निर्देशक के सिर जाता है। क्योंकि बाकी सब वही करते हैं, जो निर्देशक चाहता है।


काम करने की सबकी शैली अलग होती है। जैसे मैं स्क्रिप्ट पर अधिक ध्यान देता हूं। क्योंकि स्क्रिप्ट के आधार पर ही बाकी काम होते हैं। स्क्रिप्ट तैयार हो तो मैं सबको थीम ठीक से समझा सकता हूं। मैं फिल्म पर काम शुरू करने से पहले अपने सहयोगियों के साथ अधिक वक्त बिताता हूं। ताकि अपने विचार उनके साथ शेयर कर सकूं। इससे हम अपने विचारों पर दूसरों की राय भी हासिल कर सकते हैं। अगर एक खास तरह की लाइटिंग करनी है और कैमरामैन कहता है कि नहीं, हमें दूसरे किस्म की लाइटिंग करनी चाहिए तो मैं उसकी बात मानता हूं। क्योंकि वह जानता है कि स्क्रिप्ट के अनुकूल कैसी लाइटिंग सही रहेगी।


कभी-कभी ऐसा भी होता है जब मैं साथियों के लिए उपलब्ध नहीं होता हूं। तब पहले से ही उन्हें बता देता हूं और इसके लिए तैयार कर देता हूं कि जरूरत पडने पर वे खुद निर्णय कैसे लें। मैं यह खयाल रखता हूं कि उन्हें असमय फोन न करूं। मैं जानता हूं कि अगर मैं अपने साथियों का सम्मान नहीं करूंगा, उनकी भावनाओंकी कद्र नहीं करूंगा तो उनसे पूरा योगदान कभी नहीं ले सकता। मैं उनके साथ एक कदम चलूंगा तो वे मेरे साथ दस कदम चलेंगे।


हर किसी में कोई न कोई कमी और खूबी होती है। कमियों पर मैं ध्यान नहीं देता और खूबियों को उभारने की कोशिश करता हूं। अपने साथियों के निजी सुख-दुख में मैं जरूर शामिल होता हूं। टीम के हर सदस्य के साथ मेरा जुडाव है। कोई जब फिल्म में काम करता है तो वह जाने-अनजाने करीब आ ही जाता है। पिछले दस सालों में मैंने तीन फिल्में बनाई और हर फिल्म को बनाने में तीन-चार साल लगे। तो स्वाभाविक है कि इतने दिनों तक किसी के साथ काम करने पर अपनापन तो हो ही जाता है।


मैं जब निर्देशन करता हूं तो ऐसे लोगों को चुनता हूं जो चाटुकारिता करने वाले न हों। क्योंकि मैं पहले से ही एहतियात बरतने में विश्वास करता हूं, बाद में इलाज कराने में नहीं। मैं पहली मीटिंग में ही सभी को काम करने के तौर-तरीके बता देता हूं। ताकि ऐसा कुछ न हो जिससे फिल्म निर्माण के दौरान कोई दिक्कत आए। जब मैं ऑडिशन करता हूं तो ऐसे ही लोगों को लेता हूं जिन्हें मैं जानता हूं कि वह चाटुकारिता नहीं करेंगे ।


टीम भावना यह है कि टीम के हर सदस्य को सबकी अच्छाइयों और बुराइयों को समझना चाहिए। इसी हिसाब से उन्हें काम देना चाहिए। सभी को याद रखना चाहिए कि कोई भी काम व्यक्तिगत नहीं है। हम सब काम कर रहे हैं एक मकसद पूरा करने के लिए। सबका मकसद एक है, इसलिए हम सब साथ-साथ हैं।


गाइडलाइन भी जरूरी है- कविता बडजात्या, निर्मात्री


जहां तक मेरे काम करने की शैली की बात है तो वह एकदम साधारण है। कोई भी प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले हम कांसेप्ट को लेकर एकमत होने की कोशिश करते हैं। जरूरत के अनुरूप शोध भी करते हैं। इसके बाद स्क्रिप्ट लिखी जाती है। रही-सही कसर हम वर्कशॉप में पूरी कर लेते हैं। हम नहीं चाहते कि शूटिंग के वक्त कलाकार अथवा तकनीशियनों के मन में किसी तरह की दुविधा रहे। सभी को अपनी-अपनी भूमिका मालूम होनी जरूरी है। तभी टीम स्पिरिट अपना प्रभाव छोड पाती है। वर्कशॉप के दौरान हम सभी को अपने-अपने सुझाव रखने का मौका देते हैं। जिस सुझाव में दम नजर आता है, उस पर उचित रूप से विचार विमर्श होता है। हम प्रोजेक्ट के लिए फायदेमंद हर सुझाव का स्वागत करते हैं। मैं सेट पर कम जाती हूं मगर जब जाती हूं तो कभी भी खुद को प्रोड्यूसर के तौर पर पेश नहीं करती। शायद यही वजह है कि एक स्पॉट बॉय भी मेरे सामने खडे होकर चाय पीने का अधिकार रखता है।


जहां तक बात गलतियों की है तो किससे गलती नहीं होती। कई बार अनजाने में ही सही, मुझसे भी गलती हुई है। सबके सामने अपनी गलती कबूल करने में कोई बुराई नहीं। अगर कोई जान बूझकर गलती कर रहा हो तो उसे भी मैं सुधरने का एक मौका जरूर देता हूं। पता नहीं किस मजबूरी में उसने गलती की हो। इसके बावजूद अगर गलती दोहराई जाए तो सजा जरूरी हो जाती है। एक की गलती की सजा पूरे प्रोडक्शन हाउस को क्यों दी जाए। हमने अपने किसी भी आर्टिस्ट या तकनीशियन पर कभी किसी तरह का प्रतिबंध नहीं रखा। मैं बस यही चाहती हूं कि अगर आपने कोई जिम्मेदारी ली है तो उसे अंत तक निभाएं। आपको कोई समस्या है तो उसे मेरे साथ पूरी सच्चाई और ईमानदारी के साथ शेयर करें।


फिल्म हो या टीवी सीरियल हमने हमेशा एक परिवार के ढांचे में रहकर काम किया है। राजश्री में हर आदमी एक नजर से देखा जाता रहा है। भले ही प्रोजेक्ट बंद हो चुका हो पर हम अपने परिवार के सदस्य को कभी नजरअंदाज नहीं कर सकते। आज मैं सीरियल बना रही हूं, हो सकता है कल निर्देशन भी करूं। इसके बाद भी मैं यही कहूंगी कि इस क्षेत्र में अकेले दम पर सफलता हासिल करने का झूठा दंभ मैं नहीं भर सकती।


महत्वपूर्ण है टीम भावना- श्याम कौशल, एक्शन डायरेक्टर


टीम भावना किसी भी काम के लिए महत्वपूर्ण होती है। अकेला व्यक्ति कोई भी काम सफलतापूर्वक नहीं कर सकता। मेरे साथ तो यह बात और भी जोरदार ढंग से लागू होती है। मैं जो सोचता हूं और जो एक्शन देना चाहता हूं, मेरी टीम ही उसे अंजाम देती है। छोटे से छोटे स्टंट में भी टीम का होना आवश्यक होता है। इस काम में एक-दूसरे पर विश्वास होना भी बहुत जरूरी है। टीम के सभी व्यक्ति हमारे लिए परिवार के सदस्य हैं। उन्हें मैं उतना ही प्यार देता हूं, जितना अपने परिवार के सदस्यों को देता हूं।


स्टंट का काम जोखिम भरा होता है। इसे करते समय मन और दिमाग बहुत शांत होना चाहिए। इसके लिए पहले होमवर्क बहुत जरूरी है। हम सबसे पहले कागज पर एक्शन का पूरा खाका तैयार कर लेते हैं। फिर हर व्यक्ति को उसके काम के बारे में अच्छी तरह समझा देते हैं। अगर सभी व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह निभाते हैं तो काम करना आसान होता है। अगर ब्लास्ट का सीन है तो कैसे कंट्रोल करना है, सबको पता होना चाहिए। मेरी टीम में 15 सदस्य हैं। हर एक की अलग-अलग डयूटी तय है। जब हम काम की प्लानिंग करते हैं तो टीम के किसी भी सदस्य को अपनी बात कहने की पूरी आजादी देते हैं। अगर उनके किसी सुझाव से हमें लाभ होता है तो मैं उन्हें पुरस्कृत भी करता हूं। मैं कभी भी रूखे स्वर में अपनी टीम के किसी सदस्य से बात नहीं करता।


मैंने खुद अपनी टीम के किसी भी सदस्य को कभी भी बात या फोन करने के लिए मना नहीं किया है। हालांकि वे जानते हैं कि शाम को मैं अपने परिवार के साथ समय बिताना पसंद करता हूं, पर अगर उस समय भी उनकी कोई निजी या व्यावसायिक समस्या हो तो वे मुझसे बेझिझक बात कर सकते हैं।उनकी समस्या का समाधान मैं सबसे पहले करता हूं। टीम के सभी सदस्य मुझे बडा भाई ही मानते हैं।


जब कभी दिन-रात शूटिंग होती है तो शिडयूल को थोडा बदल दिया जाता है। ताकि सभी को आराम मिले और काम अच्छा हो। अगर मैं किसी की किसी बात से नाराज होकर उसे डांटता भी हूं तो सबको पता होता है कि यह सिर्फ सुधारने के लिए है। मेरे लिए टीम के सभी सदस्य मेरे बच्चों जैसे हैं। साल में दो-तीन गेट टुगेदर जरूर करता हूं, जिसमें साथ-साथ खाना-पीना सब करता हूं। वहां वे मेरे गेस्ट होते हैं। किसी भी पार्टी या फंक्शन में श्याम कौशल एंड पार्टी को अगर आमंत्रण नहीं दिया जाता तो मैं वहां नहीं जाता। उनके हर दुख-सुख में मैं और मेरी पत्नी दोनों ही शामिल होते हैं। अगर हमारी टीम कहीं बाहर है और उनके परिवार वालों को हमारी जरूरत है तो मेरी पत्नी उनका पूरा खयाल रखती है।


फिल्म ओम शांति ओम के एक दृश्य को फिल्माना बडा ही कठिन था। इसमें पूरी टीम को एकदम सही समय पर सही तरह से काम करना था। लकडी के सेट के अंदर आग के दृश्य को दिखाया गया था, जिसमें कुल 70 लोग थे। ऐसे में किसी एक की गलती दूसरे पर भारी पड सकती थी। इसलिए किसी प्रकार की दुर्घटना न हो इसकी जिम्मेदारी सभी लेते हैं। सभी को एक-दूसरे पर विश्वास होता है। इसके अलावा कृष और ब्लैक फ्राइडे में भी काफी कठिन स्टंट थे। आने वाली फिल्मों में द्रोणा, कमीने और रब ने बना दी जोडी आदि हैं। चार साल पहले की बात है। जब पेट में भयंकर दर्द के कारण मैं हॉस्पिटल में था। मेरी टीम दिन-रात मेरे पास रही। मुझे लग नहीं रहा था कि मैं बच सकूंगा, पर उनकी दुआ से आज मैं काम कर रहा हूं। जब मैं ठीक हुआ तो परिवार सहित टीम के सभी सदस्यों के घर गया और सबको मिठाई खिलाई। साथ में धन्यवाद पत्र दिया, क्योंकि उनकी मदद के बिना मुझे मेरी जिंदगी नहीं मिल सकती थी।


सफलता में सबका योगदान- सागर बल्लरी, सिने निर्देशक


मेरी सफलता में मेरी पूरी टीम का योगदान है। फिल्म भेजा फ्राई के दौरान एक्टर से लेकर कैमरामैन, एडिटर, साउंड डायरेक्टर और संगीतकार सभी ने पूरा सहयोग दिया। उनके सहयोग के चलते ही यह फिल्म बन सकी और कामयाब रही। मैं काम शुरू करने से पहले अपनी टीम के साथ फिल्म पर चर्चा करता हूं। सबके काम को ठीक से बता देता हूं, ताकि शूटिंग करते समय पता हो कि किसे क्या करना है। इससे काम आसान हो जाता है। मेरे सहयोगी मुझसे अपनी बात कभी भी कह सकते हैं। परंतु यह काम मैं शूटिंग से पहले ही करता हूं। जब मैं स्क्रिप्ट लेकर बैठता हूं तो सबके सुझाव सुनता हूं। जो सही लगते हैं उन पर अमल भी करता हूं। अपनी टीम के सदस्यों के लिए हमेशा उपलब्ध रहता हूं। कोई भी बात अगर मेरे पेशे से जुडी हो तो सब कुछ छोडकर उसे पहले करता हूं।

Read – बस थोड़ी सी खट्टी इमली और वो भी मसाले वाली ….


मैं हमेशा ही किसी काम को पहले टेबल पर बैठकर करता हूं, ताकि शूटिंग के दौरान कोई परेशानी न हो। इसके अलावा जब किसी फिल्म की स्टार कास्टिंग करता हूं तो कहानी के अनुसार उस चरित्र को ढूंढता हूं जिससे चरित्र उसी में जिएं और उसे निभाने में अधिक समय न लगे। शूटिंग के काम में समय का महत्व अधिक होता है। इसलिए हमेशा मेरी कोशिश यह रहती है कि ठीक समय पर काम खत्म हो, जिससे हमें नुकसान न हो। अगर किसी को अधिक समय काम करना भी पडे तो उसे आराम देकर दूसरे सदस्य को बुला लिया जाता है।


मेरे साथी मेरे परिवार के सदस्य हैं। उनके दुख-सुख में मैं हमेशा उनके साथ रहता हूं। उन्हें किसी प्रकार की परेशानी हो तो उसकी वजह जानने की कोशिश करता हूं। क्योंकि अगर वे परेशान होंगे तो उनका मन काम में नहीं लगेगा। मैं उनके खाने-पीने उठने-बैठने का पूरा खयाल रखता हूं। अगर मेरा कोई साथी छोटी-मोटी गलती करे तो मैं कुछ अधिक नहीं कहता। काम के दौरान ऐसा होता रहता है। पर अगर कोई बडी गलती हो गई तो उन्हें बताता हूं कि उसका असर क्या होगा। इससे वे अपने आपको सुधार सकेंगे, जो उनके लिए भी बेहतर होगा। मेरी टीम के सभी सदस्य मेरे अपने हैं। अगर उनके घर परिवार में कुछ समस्या है तो इसका असर उनके काम पर पडता है। उनका मन काम में नहीं लगता। इसलिए मैं उनका ध्यान रखता हूं। टीमलीडर होने के नाते यह मेरा फर्ज भी है। मुझे गुस्सा तो आता है, पर अधिक समय तक नहीं रहता। सुरेश पाई जो मेरे साथी हैं, उनका सहयोग हमेशा मेरे साथ रहा है।


वन मैन शो नहीं है क्रिकेट- महेश रावत, विकेटकीपर


क्रिकेट का खेल वन मैन शो नहीं है। इसमें टीम भावना के बिना किसी भी मैच में सफलता नहीं मिल सकती। इसका सबसे बडा उदाहरण आईपीएल क्रिकेट टूर्नामेंट रहा, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जबर्दस्त सफल रहा। उसमें भी विजेता बनी राजस्थान रॉयल्स, जिसे शुरुआत में सबसे कमजोर समझा जा रहा था, पर कप्तान शेनवार्न के नेतृत्व में पूरी टीम ने जो योजना बनाई और मैच दर मैच जीतते हुए आखिर में चैंपियनशिप पर भी राजस्थान रॉयल्स ने कब्जा किया, उससे साबित होता है कि किसी भी प्रोजेक्ट की सफलता में टीम भावना बहुत मायने रखती है।


मैं क्रिकेटर हूं, मुझे अपने कप्तान की ओर से जो भूमिका दी जाती है, उसमें अपना सौ प्रतिशत देने की कोशिश करता हूं। चाहे वह विकेटकीपर के तौर पर हो या बल्लेबाज के तौर पर। जिनसे मैं शुरू से ही संपर्क में हूं और जो मुझे महत्वपूर्ण लगते हैं, उनसे मैं सलाह लेता रहता हूं। फिर जो मेरे हित में होता है, उसी अनुरूप चलता हूं। जब मैं अपने प्रदर्शन से संतुष्ट नहीं होता हूं तो तनाव में होता हूं। अगर मुझे लगता है कि मेरे साथी कहीं गलती पर हैं और उन्हें मेरी सलाह की जरूरत है, तो मैं उनके साथ शांत माहौल में चर्चा करता हूं, ताकि उसे दूर कर वह अपने लक्ष्य की ओर बढ सकें। हर किसी को तो संतुष्ट नहीं किया जा सकता, पर कोशिश करता हूं कि मेरे प्रति साथियों की जो भावनाएं व आशाएं हैं, उनको पूरा करूं। क्रिकेट मेरी पहली प्राथमिकता है, पर जब भी जरूरत होती है मैं अपने साथियों के सुख-दुख में शामिल होने की पूरी कोशिश करता हूं।


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