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तेरे घर के सामने.......

Posted On: 26 Sep, 2012 मेट्रो लाइफ में

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घर की चारदीवारी जहां हमें हर तरह से सुरक्षा देती है, वहीं उसके आसपास के वातावरण से हमारे सामाजिक जीवन की शुरुआत होती है। आपने कभी यह कल्पना की है कि अगर आपके घर में खिडकियां न हों तो आपको कैसा महसूस होगा? अगर आपको वातावरण की जीवंतता से जरा सा भी प्यार है तो यह कल्पना भी आपको डरा देगी। वैसे यह अलग बात है कि आजकल महानगरों में सेंट्रली एयरकंडीशंड फ्लैट्स भी बनने लगे हैं, जिनके भीतर जाने के बाद आप अपने आसपास की दुनिया से पूरी तरह कट जाते हैं। यहां सवाल यह नहीं है कि किस तरह के मकान अच्छे होते हैं, बल्कि अहम मुद्दा यह है कि आप अपने आसपास के माहौल से किस हद तक जुडे हैं।


सामाजिकता का पैमाना

अपने आसपास के माहौल से जुडाव इस बात का पैरामीटर है कि आप कितने सामाजिक व्यक्ति हैं। जब बच्चा चलना सीखता है तो जिस पल घर की दहलीज के बाहर वह अपना पहला कदम रखता है, उसी क्षण से उसके सामाजिक जीवन की शुरुआत हो जाती है। वह अपने आसपास के माहौल को देखकर बहुत कुछ सीखता-समझता है। दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करना है, अपने अलावा दूसरों का भी किस तरह खयाल रखना है, ये सारी बातें घर से बाहर निकलने पर ही सीखी जा सकती हैं। इसी तरह धीरे-धीरे इंसान के समाजीकरण की प्रक्रिया शुरू होती है और वह अपने आसपास के माहौल से स्वयं को जुडा हुआ महसूस करने लगता है।


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व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव

मनोवैज्ञानिकों का ऐसा मानना है कि अपने घर केआसपास के माहौल का बच्चे के व्यक्तित्व के विकास में बहुत बडा योगदान होता है। बच्चा जिस माहौल में पला-बढा होता है, उसके व्यक्तित्व पर आजीवन उस माहौल का असर दिखाई देता है। 40 वर्षीय संदीप पांडे पेशे से आर्किटेक्ट हैं और स्वयं अपने परिवार के साथ दिल्ली की एक पॉश कॉलोनी के अपार्टमेंट में रहते हैं। उनका कहना है,मेरा बचपन और किशोरावस्था का कुछ समय बनारस की गलियों में बीता है। अपना शहर छोडे हुए मुझे पंद्रह वर्ष से ज्यादा समय हो चुका है लेकिन वहां के माहौल की जिंदादिली आज भी कहीं न कहीं मेरे भीतर शेष है। यहां के व्यस्त और एकाकी जीवन में भी मैं अपने पुराने शहर की यादों को जिंदा रखने की बहुत कोशिशें करता हूं। जैसे- मैंने अपने अपार्टमेंट में जन्माष्टमी और वसंत पंचमी जैसे त्योहार सामूहिक रूप से मनाने की शुरुआत की ताकि मैं अपने बच्चों को बता सकूं कि जन्माष्टमी के अवसर हम पास-पडोस के बच्चे आपस में मिलकर किस तरह श्रीकृष्ण भगवान की झांकी सजाते थे और सरस्वती माता की पूजा करते थे। यह केवल पूजा का मामला नहीं है, बल्कि इसके जरिये आसपास के बच्चों से हमारी दोस्ती होती थी और हम मिलजुलकर काम करना सीखते थे।

जीना सिखाता है माहौल

हिंदी के कथाकार विनोद कुमार शुक्ल ने अपने उपन्यास दीवार में खिडकी रहती थी में घर के ऊपर बहुत सुंदर वाक्य लिखा है, घर के साथ सबसे अच्छी बात यह होती है कि घर हमारे रहने से कहीं ज्यादा लौटकर आने के लिए होता है। सच, कितना सुखद होता है अपने घर लौटकर आना। हमारे आसपास रोज पक्षी चहचहाते हैं, रोज दुकानें खुली होती हैं, रोज बच्चे गली में क्रिकेट खेलते हैं, ऑफिस जाते समय नुक्कड वाले पान की दुकान पर आप रोजाना पल भर के लिए रुकते हैं..यह सब आपकी रोजमर्रा जिंदगी का अहम हिस्सा है। आमतौर पर इन बातों पर किसी का भी ध्यान नहीं जाता। आप भी यही सोचते होंगे कि आखिर इसमें नया और खास क्या है? लेकिन इन छोटी-छोटी बातों में भी बहुत कुछ खास होता है। अगर दुर्भाग्यवश कभी किसी को कफ्र्यू का सामना करना पडा हो तो वह इस बात का मतलब अच्छी तरह समझ सकता है कि आसपास का जीवंत माहौल क्या मायने रखता है? दरअसल हमारे आसपास का खुशनुमा माहौल ही हमें जिंदगी से प्यार करना और जीना सिखाता है। यह तो हमारा मानना है लेकिन क्या देश की मशहूर हस्तियां भी ऐसा ही सोचती हैं? आइए जानते हैं, उन्हीं की जुबानी..


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पाली हिल है सबसे अच्छा

ऋषि कपूर (Rishi Kapoor), अभिनेता

निवास स्थान: कृष्णा-राज, पाली हिल, मुंबई


क्या है पसंद: मुझे अपने घर में जो सुकून मिलता है, वो दुनिया के किसी भी फाइव स्टार होटल में नहीं मिल सकता।


घर की खासियत: हमारे बंगले के दूसरे हिस्से में सर्वेट्स क्वार्टर हैं, जहां हमारा स्टाफ रहता है। हमारे मेन बंगले के पीछे की तरफ हमने बहुत सुंदर पेंटहाउस बनवाया है, जिसे सुंदर ढंग से सजाने का काम नीतू ने किया है। हमारे यहां आनेवाले मेहमान उसकी तारीफ करते नहीं थकते।


कैसा है आसपास का माहौल: मुंबई की ट्रैफिक और शोर-शराबे की वजह से यहां पॉल्यूशन बहुत ज्यादा बढ गया है। पर मुझे इस बात की बेहद खुशी है कि पाली हिल में आज भी वैसी ही शांति है, जैसी कि पहले थी। मुंबई में इससे अच्छी कोई दूसरी जगह हो ही नहीं सकती। हिल स्टेशन की तरह दिखने वाले इस इलाके में प्राकृतिक सौंदर्य वाकई लाजवाब है।


यादें पुराने घर की: मैंने अपना पूरा बचपन चेंबूर स्थित आर. के. कॉटेज में बिताया है। वो इलाका भी काफी शांत और साफ-सुथरा हुआ करता था। बाद में शम्मी और शशि अंकल वहां से मालाबार हिल्स शिफ्ट हो गए। लेकिन मेरे पापा को चेंबूर इतना पसंद था कि वह उसे छोडने को तैयार नहीं थे। उस घर से मेरे बचपन की न जाने कितनी यादें जुडी हुई हैं। मेरे सभी चाचाओं की शादियां और हम सब भाई-बहनों का जन्म उसी बंगले में हुआ। आज भी मेरी मम्मी वहीं रहती हैं। नीतू उसी बंगले में दुलहन बन कर आई थी।


मेरा पास-पडोस: यहां हमारे सबसे करीबी पडोसी हैं दिलीप कुमार। इसके अलावा प्रिया और संजय दत्त भी यहीं रहते हैं। यहां बॉलीवुड से बाहर के लोग भी रहते हैं, पर ऐसे लोगों से बातचीत करने का मौका मुझे नहीं मिल पाता। लेकिन उनके साथ नीतू के बहुत अच्छे संबंध हैं। वह पडोस की लेडीज के साथ किटी पार्टीज और जिम की एक्टिविटीज भी बहुत एंजॉय करती है।


बागवानी का शौक: नीतू को पेड-पौधे बहुत पसंद हैं। उसने हमारे बंगले में खूबसूरत गार्डन बनाया है। हमारे गार्डन की लैंडस्केपिंग तो इतनी सुंदर है कि जो भी उसे देखता है, उसकी तारीफ किए बिना नहीं रह पाता।


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क्या करते हैं आसपास के लिए: बहुत ज्यादा तो कुछ नहीं कर पाता लेकिन मुझे याद है कि एक बार हमारे पाली हिल में पानी की कटौती की वजह से यहां रहने वालों को बहुत परेशानी हुई थी। इस समस्या को सुलझाने के लिए यहां के लोगों ने काफी कोशिशें कीं। व्यस्तता की वजह से मैं सोसायटी की बैठकों में तो नहीं जा पाता था, लेकिन अपने पत्रों के जरिये मैंने उन्हें हमेशा अपना समर्थन दिया।


हर तरह की सुविधाएं हैं आसपास


उदित नारायण (Udit Narayan), गायक


निवास स्थान: ओबेरॉय टॉवर, लोखंडवाला, मुंबई


क्या पसंद है: यह जगह मुंबई के व्यस्ततम व्यावसायिक सेंटरों में एक है। मेरे घर के इर्द-गिर्द पांच-छह खूबसूरत मॉल्स, फूड सेंटर्स आदि बन गए हैं। इस वजह से हमें शॉपिंग आदि के लिए दूर नहीं जाना पडता। ज्यादातर रिकॉर्डिग सेंटर भी यहीं बन गए हैं, इसलिए मुझे रिकॉर्डिग के लिए जाने में बहुत सुविधा होती है। ओबेरॉय टॉवर का टैरेस फ्लैट होने के नाते हमें अपने फ्लैट में चारों दिशाओं से खुली हवा, धूप और बाहर का शानदार नजारा देखने को मिलता है।


कैसा था पुराना घर: संघर्ष के दिनों में मैंने कालीना में एक छोटा सा घर खरीदा था। वह मेरे लिए बेहद लकी साबित हुआ, इसीलिए मैंने आज भी उसे बेचा नहीं है। कभी-कभार वहां जाता हूं और अपने पुराने दिनों को याद करता हूं। वहां की बेपरवाह जिंदगी, जमीन पर बैठकर खाना-पीना, अडोस-पडोस के दोस्तों के साथ अपने सुख-दुख शेयर करना जैसी बातें यहां नहीं हैं। संघर्ष के दिन आज भी काम करते रहने के लिए प्रेरित करते हैं।


पास-पडोस: हमारी इस बिल्डिंग में बॉलीवुड की अकेली शख्सीयत हम लोग ही हैं। शेष सारे लोग कॉरपोरेट सेक्टर के अथवा बिजनेसमैन हैं। गणेशोत्सव, होली और दीवाली जैसे त्योहारों पर हम एक-दूसरे से मिलते हैं। हमारे सामने की बिल्डिंग में अक्षय-ट्विंकल रहते हैं, उसी के आसपास कहीं सुनिधि चौहान भी रहती हैं।


पडोसियों से संबंध: शुरू-शुरू में जब हम यहां आए थे, तब आते-जाते लोग हमें ध्यान से देखते थे। कुछ बच्चे आकर पूछते थे कि मैं वही उदित नारायण हूं ना जिसने पापा कहते हैं बडा नाम करेगा. गाया था?


बच्चे के दोस्त: आदित्य जिन दिनों स्कूल में पढता था, सोसायटी में उसके बहुत सारे दोस्त हुआ करते थे। वे अकसर क्रिकेट, बैडमिंटन, फुटबॉल आदि खेलते थे। ये बच्चे आदित्य के साथ अकसर घर पर भी आते थे।


क्या है नापसंद: पहले जब मैं यहां शिफ्ट हुआ था तो यहां बहुत शांति थी। लेकिन अब यह इलाका काफी भीड-भाड वाला हो गया है और यहां काफी शोर भी है, जो मुझे पसंद नहीं है।


हरियाली देती है सुकून


पंडित बिरजू महाराज, कथक गुरु


निवास स्थान: सरकारी फ्लैट, शाहजहां रोड, दिल्ली


क्या पसंद है: यह बहुत अच्छी बात है कि मेरा घर ग्राउंड फ्लोर पर है। मेरे घर के आसपास बहुत हरियाली है, जो मेरे मन को बहुत सुकून देती है। मेरे घर के ठीक सामने एक बेल का पेड है, जो मुझे विशेष रूप से प्रिय है, क्योंकि मैं भगवान शिव का भक्त हूं और उन्हें प्रतिदिन बेलपत्र चढाता हूं।


फुरसत के पल: मुझे अपने घर का आंगन सबसे ज्यादा पसंद है, जहां प्रात:काल उठकर मैं सूर्य भगवान और तुलसी को जल देता हूं और थोडी देर के लिए वहां खुले आकाश के नीचे सुकून के कुछ पल बिताना पसंद करता हूं। वरना, दिल्ली जैसे शहर के घरों में आंगन बहुत कम ही देखने को मिलते हैं।


पुराने घर की यादें: मेरा बचपन तो लखनऊ में बीता है। वहां मेरा बहुत बडा पुश्तैनी मकान है, जहां हमारी पिछली छह पीढियां रहती आ रही हैं। उस घर और अपने शहर लखनऊ की याद में आज भी मेरा मन उदास हो उठता है। वहां बहुत बडी छत थी, जहां मैं खूब पतंगें उडाता था। वह घर आज बिलकुल खाली पडा है। मैं समय निकालकर वहां की सफाई-मरम्मत आदि कराता रहता हूं। मेरी इच्छा है कि उस स्थान को राष्ट्रीय धरोहर के रूप में सुरक्षित किया जाए।


पास-पडोस: पास-पडोस की कमी बहुत खलती है यहां। छोटे-शहरों की तरह यहां मुहल्लेदारी की भावना देखने को नहीं मिलती। लखनऊ में पास-पडोस के लोग एक-दूसरे के हर सुख-दुख में शामिल होते थे, लेकिन यहां वो बात नहीं है। मैं सरकारी आवास में रहता हूं। अगर किसी से थोडी-सी जान-पहचान हो भी जाती है तो कुछ दिनों के बाद वह परिवार कहीं और शिफ्ट हो जाता है। हां, मेरे घर से थोडी दूरी पर साईबाबा का मंदिर, हनुमान मंदिर और चर्च है। मैं अकसर इन धर्मस्थलों पर दर्शन करने जाता हूं और वहां मेरे मन को बहुत शांति मिलती है।


नापसंद हैं शांति भंग करने वाले लोग


खुशवंत सिंह, लेखक एवं पत्रकार


निवास स्थान: सुजान सिंह पार्क, दिल्ली


क्या पसंद है: मेरे फ्लैट के ठीक सामने पार्क है, जो मुझे बहुत पसंद है। यहां से दिल्ली की सभी खास जगहें बिलकुल पास हैं और जरूरत की सारी चीजें बहुत आसानी से मिल जाती हैं।


कैसा है पास-पडोस: केवल पास-पडोस ही नहीं बल्कि मुझे अपने शहर दिल्ली से भी बेहद लगाव है। जब मैं लगभग पांच वर्ष का था तभी माता-पिता और दादी के साथ अपने पैतृक गांव हाडली (अब पाकिस्तान में) से दिल्ली आ गया था। यह 1920 की बात है। तब दिल्ली को बसाने और बनाने का काम जोरों से चल रहा था। दरअसल, उस दौरान मेरे पिता सरदार सोभा जी और दादाजी सुजान सिंह को दिल्ली की कई बडी इमारतें बनाने का ठेका मिला था। हमारे आसपास के ज्यादातर लोग व्यवहारकुशल और खुशमिजाज हैं। मेरे ठीक सामने वाले फ्लैट में मेरी बडी बेटी माला रहती है। मेरी पत्नी कंवल के देहांत के बाद से वही मेरी देखभाल करती है।


पुराने घर की यादें: दिल्ली आने के बाद शुरुआत में हम ओल्ड मिल रोड पर (जो अब रफी मार्ग कहलाता है) एक बेहद मामूली लेकिन बडे से घर में रहते थे। कुछ समय के बाद मेरे पिता ने जंतर-मंतर मार्ग पर एक आलीशान कोठी बनवाई। बाद में उसे बेच कर उससे भी बडी कोठी 1-ए जनपथ पर बनवाई, जिसमें लगभग तीन एकड का बगीचा था। हालांकि अब भी वह घर मौजूद है, लेकिन मैं वहां से सुजान सिंह पार्कस्थित दो कमरे के फ्लैट में शिफ्ट हो गया हूं। लेकिन उस घर की यादें मेरे दिल में आज भी ताजा हैं।


बागवानी से लगाव: मुझे पेड-पौधे बेहद पसंद हैं। अपने घर के पिछले हिस्से के आंगन में मैंने अपने हाथों से कई फलों जैसे-आम, खुबानी आदि के पेड लगाए हैं।


फुरसत के वक्त कैसे बिताते हैं: अब मैं 94 वर्ष का हो चुका हूं। इस लिए घर पर ही रह कर पढना-लिखना पसंद करता हूं। क्लबों की सदस्यता से त्यागपत्र दे चुका हूं और पार्टियों में भी नहीं जाता।


क्या नापसंद है: मुझे ऐसे लोग सख्त नापसंद हैं, जो बिना पूर्व सूचना के घर पर मिलने चले आते हैं। दरअसल, मैं एकांतप्रिय व्यक्ति हूं और बेवजह कॉलबेल बजाकर मेरी शांति भंग करने वाले लोगों के लिए ही मैंने अपने घर के बाहर एक बोर्ड लगा रखा है प्लीज डॉन्ट रिंग द बेल अनलेस यू आर एक्पेक्टेड।


करती हूं जरूरतमंदों की मदद


चित्रा मुद्गल, साहित्यकार


निवास स्थान: वर्धमान अपार्टमेंट, मयूर विहार, फेज-1, दिल्ली


क्या पसंद है: हमारे घर के आसपास बहुत अच्छी मार्केट है, जहां रोजमर्रा जरूरत की बहुत चीजें मिल जाती हैं। मेरा निवास स्थान मुख्य सडक के बिलकुल पास है। इसलिए यहां से कहीं जाना हमारे लिए बहुत आसान होता है।


पास-पडोस: हमारे पडोस में एक कश्मीरी परिवार रहता है, जिससे हमारा बेहद आत्मीय रिश्ता है।


भावनात्मक लगाव: मुझे प्रकृति से बहुत गहरा लगाव है। मेरे घर के आसपास बहुत सारे पेड-पौधे हैं और यहां सुबह के समय तरह-तरह के सुंदर पक्षियों का कलरव सुनाई देता है।


क्या करती हैं आसपास के लिए: मेरे घर के पास ही चिल्ला गांव है। जहां किसान और श्रमिक वर्ग के लोग रहते हैं। जिनमें से कुछ लोग भी हैं, जो रिक्शा चलाते हैं और रेहडी पर सब्जी-फल आदि बेचने का काम करते हैं। उन्हें भी मैं अपने पास-पडोस का अहम हिस्सा मानती हूं। अकसर उन लोगों से बातें करके उनकी तकलीफें जानती हूं और उन्हें दूर करने की भी कोशिश करती हूं। इस काम में पडोसियों का भी पूरा सहयोग मिलता है।


क्या है कमी: वैसे तो यहां सारी सुविधाएं हैं पर मुझे कुछ बातों की कमी बहुत खलती है। हमारे घर के आसपास दूर-दूर तक कोई लाइब्रेरी नहीं है। इस वजह से पढने की इच्छा रखते हुए भी घरेलू स्त्रियां किताबें नहीं पढ पातीं। साथ ही यहां नौकरीपेशा वर्ग के लिए कोई ऐसा क्लब या कम्यूनिटी सेंटर नहीं है, जहां लोग फुर्सत के क्षणों में आपस में मिलजुलकर बातें कर सकें।


कोशिश पर्यावरण बचाने की


अर्पणा कौर, चित्रकार


निवास स्थान: सीरीफोर्ट इंस्टीट्यूशनल एरिया, दिल्ली


क्या पसंद है: खुशकिस्मती से मेरे घर के पास सोलहवीं शताब्दी में निर्मित सीरीफोर्ट है, जिसका कुछ हिस्सा स्टेडियम बनाने के दौरान ध्वस्त कर दिया गया था। फिर भी उस दीवार के अवशेष बचे हुए हैं। जब मैं सुबह की सैर के लिए इस ऐतिहासिक स्थल के पास से गुजरती हूं तो यह एहसास मुझे रोमांचित कर देता है कि इतने पुराने ऐतिहासिक स्थल के पास मेरा घर है। मुझे अपने घर के आसपास का खुला प्राकृतिक वातावरण भी बहुत पसंद है। साथ ही मेरे घर के सामने आर्केलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया हेरिटेज म्यूजियम है, जो मुझे खास तौर से पसंद है।


पास-पडोस: चूंकि हमारा घर इंस्टीट्यूशनल एरिया में है, इसलिए पास-पडोस के नाम पर रिहायशी मकानों के बजाय सरकारी और निजी संस्थान ज्यादा हैं। फिर भी आसपास स्थित रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन के सदस्यों का हमारे साथ सहयोगात्मक रवैया रहता है।


क्या है नापसंद: हमारा घर दिल्ली के मुख्य लोकेशन पर स्थित है। इसलिए यहां भू-माफिया अधिक सक्रिय हैं। जो यहां के हरे-भरे जंगल को काटकर तेजी से कंक्रीट के जंगल बसाए जा रहा है। घर से थोडी दूरी पर एक पब्लिक पार्क था जो खेल गांव का हिस्सा होता था, इसे खेल गांव वालों ने एक निजी रेस्तरां वालों को बेच दिया। इस पार्क के आसपास 800 रिहायशी आवास हैं। अब इस पार्क में बारात घर बना दिया गया है, जहां शादियों के बैंड और डीजे के शोर के कारण लोगों की नींद में खलल पैदा होती है।


क्या करती हैं आसपास के लिए: आसपास जितनी भी खाली जमीन बची है, उसमें पेड लगा कर उसे फिर से हरा-भरा करने की कोशिश कर रही हूं। यहां के जंगल तेजी से कट रहे हैं और स्टेडियम बनाने के लिए ऐतिहासिक किले की दीवार को भी ध्वस्त कर दिया गया है। किले की बची हुई दीवार और शेष जंगल को बचाने के लिए मैं अपने आसपास के दस रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन के सदस्यों के साथ मिलकर कानूनी लडाई लड रही हूं। ताकि हमारे पर्यावरण और ऐतिहासिक धरोहर को सुरक्षित रखा जा सके।


आकर्षित करती हैं सागर की लहरें


अजय देवगन, अभिनेता


निवास स्थान: जुहू, मुंबई


क्या पसंद है: जुहू का शांत वातावरण और दूर-दूर तक फैला विशाल समुद्रतट इतना सुंदर लगता है कि उसे देखकर शायरी करने को जी चाहता है। यहां रहकर मुझे इस बात का एहसास होता है कि हम कुदरत के करीब हैं। सबसे बडी बात यह है कि मैं बचपन से ही मुंबई के इसी इलाके में रहा हूं, इसलिए यह जगह मुझे इतनी पसंद है कि मैं इसे छोड कर और कहीं नहीं जा सकता। शादी के बाद जब मुझे ऐसा लगा कि हमारा पुराना घर छोटा पडने लगा है, तब मैंने इसी क्षेत्र में यह घर लिया। यह एक खास संयोग है कि मुझे, काजोल और मेरी बेटी नास्या को छुट्टी के दिन शॉपिंग करने या घूमने-फिरने में कोई दिलचस्पी नहीं है। हम तीनों छुट्टियों में परिवार के साथ घर पर ही वक्त बिताना पसंद करते हैं।


पास-पडोस: हमारा यह क्षेत्र बॉलीवुड के लोगों से भरा पडा है। अमिताभ जी से लेकर गोविंदा, देवानंद और धर्मेद्र सभी हमारे आसपास रहते हैं। यहां कुछ बडे उद्योगपति भी रहते हैं, लेकिन उनसे हमारी कोई खास जान-पहचान नहीं है। मेरे घर के पास इस्कॉन मंदिर है। मैं वहां देर रात को या फिर प्रात:काल जाना पसंद करता हूं, क्योंकि वहां की भीड से मुझे प्रार्थना करने में परेशानी होती है।


यादें बचपन के घर की: वैसे तो मेरा जन्म दिल्ली में हुआ था लेकिन जब मैं काफी छोटा था तभी मेरे पिताजी अपने करियर के लिए मुंबई शिफ्ट हो गए थे। फिर भी मुझे दिल्ली की हलकी सी याद है कि यहां की चौडी सडकें और उनके किनारे लगे हरे-भरे पेड मुझे बहुत अच्छे लगते थे। मुंबई आने के बाद मेरे पिता ने जुहू इलाके में अपना फ्लैट खरीदा। जहां हमारा पूरा बचपन बीता। हमारा घर जुहू के चंदन सिनेमा हॉल के पास था। वहां से पिताजी के लिए अपने फिल्मों के सेट्स पर जाना आसान होता था। हम दोनों भाई-बहनों के लिए मीठीबाई कॉलेज भी वहां से नजदीक था। हमने अपने उस पुराने घर को अभी तक बेचा नहीं है। मैं जुहू की गलियों में क्रिकेट खेलते हुए बडा हुआ हूं, कॉलेज के दिनों मैं भी मैं वहां क्रिकेट खेला करता था। आज भी मैं अपने बचपन के साथियों के साथ चाट खाने जुहू-चौपाटी जाता हूं। लेकिन अब सेलीब्रिटी होने के कारण हमेशा जाना संभव नहीं होता।


क्या करते हैं आसपास के लिए: अपने आसपास के लिए अभी तक कोई बडा काम तो नहीं कर पाया। लेकिन मुंबई को साफ और सुंदर बनाने वाले सभी तरह के सरकारी या गैर सरकारी अभियानों को हमेशा अपना सहयोग देता हूं।

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अच्छे हैं पास-पडोस के लोग


बरखा बिष्ट, टीवी कलाकार


निवास स्थान : मलाड, मुंबई


क्या पसंद है : मुंबई आने के बाद से मैं इसी क्षेत्र में रह रही हूं। शादी के बाद मैंने यहां अपना फ्लैट खरीदा है और आजकल उसी में रह रही हूं। मलाड मुंबई का पॉश इलाका माना जाता है। यूं तो मुंबई शहर में बडे घर मुश्किल से मिलते हैं, लेकिन मैंने काफी देखने-समझने के बाद यह अपना फ्लैट खरीदा है। हमारी हाउसिंग सोसायटी बहुत अच्छी है। औसत बजट में फ्लैट ख्ारीदने वालों को इतनी साफ-सुथरी सोसायटी बडे भाग्य से मिलती है। बिल्डिंग के फ्लैट इस तरह से डिजाइन किए हुए हैं कि सभी को खुली हवा और अच्छी धूप मिले। यहां बहुत सुंदर और साफ-सुथरे पार्क हैं। यहां का स्विमिंग पूल भी बहुत अच्छा है।


पुराने घर की यादें: मुंबई में मैंने जो पहला फ्लैट लिया था, उसमें हम चार लडकियां रहती थीं। चारों एक ही प्रोफेशन में होने के नाते हमें किसी तरह की दिक्कत नहीं होती थी। उस फ्लैट के साथ हमारे संघर्ष की बहुत सारी यादें जुडी हुई हैं। शाम ढलते-ढलते हम घर पर इकट्ठे होते तो अपने पूरे दिन की बातें एक-दूसरे से शेयर करते। अगर हममें से कोई लडकी अपने होम टाउन से वापस लौटती तो हम सब एक साथ उसके बैग पर टूट पडते कि उसके बैग में खाने-पीने की क्या चीजें हैं? इन बातों में भी बडा प्यार और अपनापन होता था।


पास-पडोस: सभी अच्छे स्वभाव के हैं। अपनी शूटिंग में व्यस्तता की वजह से हम उनसे कम ही मिल पाते हैं। गणपति पूजा या नवरात्रि जैसे अवसरों पर कभी-कभार हम मिलते हैं तो थोडी-बहुत बातें हो जाती हैं। हमारे सामने की बिल्डिंग में साक्षी तंवर और हितेन-गौरी रहते हैं। यहां बडी तादाद में टीवी कलाकार रहते हैं।


क्या करती हैं आसपास के लिए: इन बातों के लिए हमारे पास वक्त नहीं होता। यहां सारी सफाई सोसायटी द्वारा होती रहती है। अलबत्ता, हमारे पास दो डॉगी हैं और हमारी पूरी कोशिश होती है कि उनकी वजह से आसपास गंदगी न फैले और न ही किसी को कोई परेशानी हो।


बागवानी का शौक: मुझे और मेरे पति इंद्रनील दोनों को ही बागवानी का शौक है मगर हमारा फ्लैट इतना बडा नहीं है कि हम यहां कुछ कर सकें। भविष्य में अगर कोई बडा फ्लैट खरीदेंगे तभी अपना यह शौक पूरा कर पाएंगे।


कैसे बिताती हैं फुरसत के पल: हालांकि ऐसे पल बहुत कम ही मिलते हैं, लेकिन जब भी फुरसत मिलती है हम खंडाला, महाबलेश्वर आदि घूमने निकल पडते हैं।


क्या है नापसंद: वैसे तो इच्छाएं अनंत होती हैं, यहां आने के बाद हम लोग और बडे घर का सपने देखने लगे हैं। यहां की सबसे बडी कमी यह है कि किसी भी कमरे में बॉलकनी नहीं है, जहां बैठ कर चाय की चुस्कियों के साथ बारिश का आनंद लिया जा सके।


अपने आप से करें 10 सवाल

अपने घर के आसपास के माहौल से हमारा कितना जुडाव है। यह जानने की फुरसत शायद ही हम में से किसी के पास हो। इसीलिए यहां दिए गए सवालों को आप स्वयं से पूछ कर देखें:


1. क्या आपको अपने पांच पडोसियों का पूरा नाम, फ्लैट और फोन नंबर याद है?

2. जब कभी आपके घर के बाहर लगी सार्वजनिक स्ट्रीट लाइट खराब हो जाती है तो आपने कभी उसे ठीक करवाने की कोशिश की है?


3. क्या आपने अपने अपार्टमेंट के पार्क में या घर के आसपास की खुली जगह में कोई पौधा लगाया है या किसी सूखते पौधे में पानी दिया है?


4. क्या आप अपनी हाउसिंग सोसायटी की मीटिंग्स में नियमित रूप से जाते हैं?


5. क्या आप अपने आसपास के किसी सार्वजनिक स्थल-मंदिर, चर्च, क्लब या पार्क में जाते हैं?


6. क्या आप अपने आसपास के सामाजिक समारोहों जैसे स्वतंत्रता दिवस, होली-दीवाली मिलन समारोहों में शामिल होते हैं?


7. क्या आपने कभी रास्ते पर पडा कागज का टुकडा या केले का छिलका उठाकर डस्टबिन में फेंका है?


8. क्या आपने अपने किसी बीमार या परेशान पडोसी की मदद की है?


9. क्या आपको आसपास की ऐसी पांच जगहों के बारे में मालूम है, जहां आपके रोजमर्रा जरूरत की चीजें मिलती हैं?


10. क्या अपने दोस्तों और परिचितों से अपने रिहायशी इलाके की हमेशा तारीफ करते हैं?


नोट: अगर इन दस सवालों में से 7-8 सवालों का जवाब हां है तो इसका मतलब है कि आपको अपने आसपास के वातावरण से प्यार है और आप अपने इस प्यार को जिंदा रखें। अगर आपके 4-5 सवालों का जवाब हां है तो इसका अर्थ यह है कि आप अपने आसपास के माहौल को लेकर थोडे से अनमने हैं और आपको जागरूक होने की कोशिश करनी चाहिए। अगर आपके 2-3 सवालों का जवाब हां है तो यह इस बात का सूचक है कि आप अपने आसपास के माहौल के प्रति बेहद उदासीन हैं और आपको इसका कारण ढूंढने और अपनी उदासीनता दूर करने की जरूरत है।

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