blogid : 760 postid : 555

कहीं फीकी ना पड़ जाए इन तारों की चमक .....

Posted On: 15 Sep, 2012 मेट्रो लाइफ में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

विश्व में बालश्रम का निकृष्टतम रूप

1. बंधुआ और बलात बालश्रम में 5.7 मिलियन बच्चे हैं।

2. 1.8 मिलियन बच्चे देह-व्यापार या अश्लील चित्रण में हैं।

3. अवैध खरीद-फरोख्त में 1.2 मिलियन बच्चे लगे हैं।

4. 0.6 मिलियन बच्चे कई तरह के अवैध कार्यो में रत हैं।

5. सशस्त्र संघर्ष में भी 0.3 मिलियन बच्चों को शामिल किया गया है।


स्त्रोत : अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) 2002


छोटू बडे खुश नजर आ रहे हो?

आज चाचा नेहरू का जन्मदिन है न!

लेकिन तुम क्यों खुश हो?

क्योंकि चाचा नेहरू बच्चों से बहुत प्यार करते थे। कलाम जी (पूर्व राष्ट्रपति)भी तो प्यार करते हैं न हमसे?

हां, करते तो हैं..। फिर भी, खुशी का राज क्या है छोटू?


जी बस ऐसे ही, आज अंकल ने छुट्टी दी है। हम शाहरुख खान की फिल्म देखेंगे शाम को..। तीन-चार वर्ष पूर्व का वाकया है यह। चाय के ढाबे पर काम करने वाला छोटू साफ-सुथरे कपडे पहने कुछ गुनगुनाता हुआ सबको चाय पिला रहा था। ढाबा मालिक ने उसे आधे दिन की छुट्टी दे दी थी। सुबह से देर रात गए तक की व्यस्त दिनचर्या में यह छोटा सा अवकाश कितना महत्वपूर्ण होता है, यह कोई छोटू से पूछे, जिसे बारह-चौदह घंटे काम करने के एवज में उस वक्त छह सौ रुपये मिलते थे। वह तीन छोटे भाई-बहनों का पालन-पोषण कर रहा था। मां थी नहीं, पिता कहीं मजदूरी करके चार बच्चों को नहीं पाल सकते थे।


क्या ऐसे कई छोटू आपको अपने आसपास नजर नहीं आते? अलस्सुबह बस स्टॉप और रेलवे स्टेशनों पर नन्हे हाथों में चाय की केतली और कुल्हड संभाले चाय गरम चाय की हांक लगाते, रेड लाइट पर गाडियों के रुकते ही किताबें लेकर दौडे आते, पांच सौ रुपये मूल्य की पाइरेटेड किताब मोलभाव कर दो सौ या डेढ सौ में देने को तैयार छोटू, जिनके नन्हे हाथों में पामुक से लेकर डेन ब्राउन, विक्रम सेठ, अरुंधति राय, शिव खेडा, दीपक चोपडा से लेकर शोभा डे तक की किताबें हैं। यह अलग बात है कि खुद वे ए, बी, सी, डी नहीं जानते। धूल, धूप, बरसात से बचते ये नन्हे-मुन्ने खडे हैं कि कोई किताबें खरीद ले तो उन्हें खाना मिले।


कुछ और छोटू बैठे हैं सडकों के किनारे। मैले-कुचैले, सिर से पांव तक कालिमा में लिथडे जूता पॉलिश करते, पंक्चर जोडते, कूडा बीनते और खुद कूडे के ढेर में तब्दील होते, अपने ही हमउम्र बच्चों को गुब्बारे और अन्य खिलौने बेचते, मदारी के खेल में जमूरा बनते-करतब दिखाते, पान मसाला बेचते, घरों से लेकर खेतों-खलिहानों, फैक्ट्री में काम करते..।


नन्हे-मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है, मुट्ठी में है तकदीर हमारी, हमने किस्मत को वश में किया है..। कूडा बीनते इन हाथों में सफल चित्रकार बनने की कूवत है, किताबें बेचते बच्चों में लेखकबनने की। मिट्ठी ढोते, बर्तन धोते बच्चों में शायद कोई कलाकार, वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर छिपा हुआ है, लेकिन हमारे आसपास असंख्य छोटू, रामू और बहादुरों के हाथों की लकीरें बनने से पहले ही कट जा रही हैं।


मशहूर शायर निदा फाजली साहब का एक शेर है-बच्चों के छोटे हाथों को चांद-सितारे छूने दो, चार किताबें पढ कर वो भी हम जैसे बन जाएंगे..।


लेकिन यहां तो बच्चे न चांद-सितारे छू पा रहे हैं और न किताबें पढ पा रहे हैं। खेलने-कूदने ज्ञान अर्जन करने की उम्र में उन्हें सिर्फ पेट भरने के लिए काम करना पड रहा है।


हम बात कर रहे हैं बाल श्रमिकों की, जिनकी नन्ही उंगलियों में वो कमाल है कि जहां छू दें-जादू जगा दें, पत्थर की ठीकरी से संगीत पैदा कर दें। लेकिन यह हुनर सिर्फ पेट भरने के काम आए तो आजाद देश के लिए इससे शर्मनाक बात और कोई नहीं हो सकती।


क्या है बालश्रम

जनगणना 2001 के आंकडों के मुताबिक भारत में लगभग एक करोड बीस लाख बच्चे बाल श्रमिक थे। तब से आज तक स्थितियां और बदतर हुई हैं। हर बालक का मौलिक अधिकार है कि समाज उसे उत्तम सुविधाएं दे। बच्चों की शिक्षा की उपेक्षा करके उन्हें ऐसा काम दिया जाए, जो उनके लिए जोखिम बन जाए, उनके मानसिक, शारीरिक, भावनात्मक स्वास्थ्य पर कुप्रभाव डाले तो वह बालश्रम है।


अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) 1983 के अनुसार, खेलकूद की अवस्था में बच्चों से वयस्कों जैसे कार्य कराना, कम मजदूरी के लिए लंबे समय तक ऐसे कार्य कराना जिनसे उनके शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य को क्षति पहुंचे, शिक्षा और जीवन की कीमत पर काम कराना, परिवार से दूर रखना, उन अवसरों से दूर करना, जिनसे उन्हें बेहतर भविष्य मिल सकता था, बालश्रम है।


भारत में वर्ष 1981 में कारखाना अधिनियम बना। 1986 में बालश्रम निषेध अधिनियम बनाया गया। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 24 के अनुसार, 14 वर्ष से कम आयु का व्यक्ति बालक है। संयुक्त राष्ट्र के बाल अधिकार समझौते के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु का कोई भी व्यक्ति बालक है।

उम्र का वो नाजुक मोड़ और बस एक गलती ….!!!


भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार, राज्य 6 से 14 वर्ष तक की आयु वाले सभी बालकों को नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्रबंध करेगा। अनुच्छेद 23 क कहता है, बेगार या बलात श्रम निषिद्ध होगा।


कारण और किस्में

बालश्रम के आर्थिक कारणों में परिवारों की कमजोर स्थिति, संसाधनों का अभाव, वयस्क बेरोजगारी, बडा परिवार, बुनियादी जरूरतों का पूरा न होना जैसी बातें आती हैं। सामाजिक कारणों में माता-पिता की निरक्षरता, उन्हें बाल मजदूरी के कुप्रभावों की जानकारी न होना, प्राथमिक शिक्षा का अभाव, स्कूल न होना, सामाजिक उदासीनता, संवेदनहीनता, जाति प्रथा जैसी बातें आती हैं। सांस्कृतिक कारणों में पीढी दर पीढी चलने वाले पेशे (सपेरे, मदारी, जादूगर, कठपुतली), लडकियों के प्रति पक्षपातपूर्ण रवैये, बालश्रम के कठोर परिणामों के बारे में माता-पिता को जानकारी न होने जैसी बातें रखी जा सकती हैं।


बालश्रम की कई किस्में हैं, जिसमें सबसे प्रमुख है बंधुआ बाल मजदूर। ये वे बच्चे हैं, जिनके माता-पिता जमींदारों या सेठों के ऋण नहीं चुका पाते और बदले में बच्चों को बंधक रख देते हैं। ब्याज दर इतनी ऊंची होती है कि उसे चुकाने में पीढियों की बलि चढ जाती है। दूसरी किस्म प्रवासी मजदूरों की है, जो रोजगार की तलाश में माता-पिता के साथ गांव छोड कर शहरों में रहने लगते हैं। कुछ बच्चे फुटपाथ, रेलवे स्टेशनों, बस स्टेशनों पर रहने को मजबूर होते हैं। ये घर से भागे या माता-पिता द्वारा छोडे गए होते हैं। ये बच्चे सर्वाधिक शोषित हैं।


बालश्रम का नया रूप

पिछले दिनों महिला एवं बाल विकास मंत्री रेणुका चौधरी ने कहा है कि रिअॅलिटी शोज में काम करने वाले बच्चे भी बाल श्रमिक हैं, क्योंकि ये भी कई घंटे कार्य करके अर्थोपार्जन कर रहे हैं। इनकी कार्य-स्थितियां स्पष्ट नहीं है। बालश्रम की परंपरागत अवधारणा में यह एक नया आयाम है, क्योंकि टीवी कार्यक्रमों में आने वाले बच्चे गरीब परिवारों के नहीं होते।


मंत्रालय ने बाल अधिकार संरक्षण के लिए गठित राष्ट्रीय आयोग (एनसीपीसीआर) को एक पांच सदस्यीय समिति बनाने को कहा, जो ऐसे कार्यक्रमों में भागीदारी करने वाले बच्चों की कार्य- परिस्थितियों की जांच करे।

भूल जा जो हुआ उसे ..!!


एक रिअॅलिटी शो में हार की खबर से आहत लडकी पक्षाघात की शिकार हुई। इसके बाद इन कार्यक्रमों को लेकर बहसें शुरू हुई।


व्यावहारिक धरातल पर देखें तो बालश्रम व्यापक पैमाने पर फैला है। सरकारी-गैर सरकारी प्रयासों के बावजूद यह जारी है। आइए जानें इस संवेदनशील मसले पर कुछ प्रमुख लोगों और मशहूर हस्तियों के विचार।


बालश्रम और भ्रामक धारणाएं

1. बाल मजदूरी का कारण गरीबी है यह कहते हुए समस्या से मुंह मोडने की कोशिश की जाती है। कम आमदनी, निम्न कौशल स्तर, शिक्षा-प्रशिक्षण की कमी, कुपोषण, खाद्य समस्याओं के कारण गरीबी जन्म लेती है। बुनियादी सुविधाएं देकर गरीबी को खत्म किया जा सकता है।


2. बच्चे काम नहीं करेंगे तो भूखे मरेंगे परिवार तो तब भी भुखमरी के शिकार हो रहे हैं, जब घर के सारे सदस्य काम कर रहे हैं। भुखमरी का कारण है, मूल्य नीति, कम आय, कम क्रयशक्ति, आय-असमानता, असमान खाद्य वितरण, भूमि स्वामित्व की असमानता।


3. बडा परिवार होना भी है कारण इसे एक छोटी वजह माना जा सकता है, लेकिन मूल वजह है कि परिवारों की बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं हो रही हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसे मौलिक अधिकार भी लोगों को आसानी से मुहैया नहीं हैं।


4. बच्चों के हित में है काम करना यह बात पूरी तरह खारिज की जानी चाहिए कि बच्चों को काम देकर उनकी स्थिति सुधारी जा सकती है।वस्तुस्थिति यह है कि बच्चों को कम पैसे में ज्यादा घंटे काम कराया जा सकता है। ये सबसे सस्ते मजदूर हैं।


5. काम से बच्चों का कौशल बढता है ज्ञान के लिए काम सीखने और जीने के लिए काम करने में बडा फर्क है। सच यह है कि कठोर परिश्रम, ऑक्सीजन न मिलने, जहरीले रसायनों केसंपर्क में रहने से बच्चों का मानसिक-शारीरिक स्वास्थ्य अवरुद्ध होता है।

6. बालश्रम खत्म नहीं हो सकता यह काम कठिन जरूर है लेकिन यदि हमारे पास प्रभावकारी व्यवस्था और प्रशासनिक तंत्र हो, दृढ इच्छाशक्ति हो और समाज का हर व्यक्ति अपने स्तर पर कुछ करने की इच्छा रखे तो बालश्रम का उन्मूलन संभव है।


यू आर माई देसी गर्ल..


कैद में है जिनका बचपन


सुलेखा सिंह (सामाजिक कार्यकर्ता)


दिल्ली छत्तीसगढ के रायपुर शहर में थे हम। शॉपिंग कॉम्प्लेक्स के भूतल में कालीन का कारखाना था, जिसका रास्ता इतना गुप्त था कि वहां पहुंचना मुश्किल था। वहां पहुंचते ही आंखें धुंधलाने लगीं, दम घुटने लगा और खांसते-खांसते गला भर आया। दम साधे बडे से हॉल में पहुंचे तो एकबार यकीन करना मुश्किल हो गया कि वहां इतने छोटे बच्चे काम कर रहे थे, जो शायद ही ठीक से खाना खा पाते हों। ये नन्हे बुनकर कितनी नफासत से काम करते हैं, यह कारखाना मालिकों केइस वाक्य से जाहिर होता है कि जितना छोटा बच्चा होगा, उतनी ही सुंदर बुनाई होगी। इन बच्चों की उंगलियां नाजुक व पतली होती हैं, जिनसे धागों की बुनावट में दोहराव नहीं आता। उंगलियां जख्मी होकर सूज जाती हैं, लेकिन काम नहीं रुकता। जो बच्चे माता-पिता के साथ मिल कर काम करते हैं, उन्हें प्रति कालीन 100 रुपये मिलते हैं। लगभग सभी को खांसी, दमा, सांस की बीमारी है।


काम के ही सिलसिले में बीडी मजदूरों से भी मिले हम। यह एक स्लम एरिया था। हवा में दूर तक तंबाकू की बासी गंध फैली थी। हर घर के आंगन व छतों में तंबाकू की पत्तियां जा रही थीं। एक घर में देखा कि तंबाकू को बच्चे रगड-रगड कर साफ कर रहे थे। बडे-बुजुर्ग काम पर गए थे। हमें बताया गया कि तंबाकू के पत्ते सुखाना, तोडना, पीटना, साफ करना, बीडी बनाने वाले पत्ते साफ करना, उसमें तंबाकू भर कर बीडी मोडना और फिर पतले धागे से बांधना, छोटे बंडलों को बडे बंडल में पैक करना जैसे सभी काम बच्चों के जिम्मे हैं। इन्हें 150 बंडल बीडी बनाने पर 70 रुपये मजदूरी मिलती है। यदि बीडी दब गई, अच्छी नहीं बंधी, चिटक गई तो बेकार! हर घर में तपेदिक, दमा, सांस की बीमारियां फैली हैं। इन बच्चों को भी पढने-खेलने का शौक है, लेकिन जिंदगी शायद इससे भी बडी है।


सामाजिक संवेदनशीलता बहुत जरूरी है


नंदिता दास (अभिनेत्री-सामाजिक कार्यकर्ता, दिल्ली)


हर बच्चा पढाई करे, स्कूल जाए और यह सब कुछ उसके लिए उतना ही सहज हो, जितना कि खेलना-कूदना या अन्य गतिविधियां। यह सभी बच्चों का मौलिक अधिकार है। बालश्रम उन्मूलन पूरी तरह नहीं किया जा सकता, लेकिन ऐसे प्रयास जरूर कर सकते हैं कि वे खतरनाक कार्यो में अपना बचपन न खो दें। शिक्षा व्यवस्था में सुधार किया जाना चाहिए। उपयोगी शिक्षा पर बल दिया जाए। मेरा मानना है कि हर सुधार के लिए हम क्यों सरकार या एनजीओ का मुंह ताकें, खुद लोगों को अपने स्तर पर भी तो प्रयास करने चाहिए। सरकार या एनजीओ भी सीमित कोशिशें ही कर सकते हैं। समाज के हर व्यक्ति का दायित्व बनता है कि देश के भावी कर्णधारों की स्थिति को लेकर संवेदनशील बने। 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को काम पर लगाना यदि कानूनन अपराध है, तो इसका पालन किया जाना चाहिए।


महिला एवं बाल विकास मंत्री रेणुका चौधरी

रिअॅलिटी शोज में बच्चों के काम करने के मुद्दे पर मैं सिर्फ इतना कहना चाहूंगी कि ऐसे कार्यक्रमों से आम बच्चों को अपनी प्रतिभा उभारने केलिए एक मंच मिलता है। शर्त यह है कि उनकी पढाई, खेलकूद प्रभावित न हो। उन्हें बडों की तरह 10-12 घंटे काम में न खटना पडे, उनका बचपन जीवित रहे। मूल बात है सीखने का आनंद। बच्चा जो भी कार्य करे, उसमें उसे खुशी मिले। वह मन से पढाई करे, शौकिया काम भी सीखे। कोई भी काम उसे बेमन से या इसलिए न करना पडे कि इसके बगैर वह भूखा मर जाएगा, यह जरूरी है।


हर बच्चे को मिले रोटी और प्राथमिक शिक्षा

राहुल बोस (अभिनेता-सामाजिक कार्यकर्ता, मुंबई)


बच्चों के सामाजिक कल्याण और विकास के बारे में सोच कर मैं उदास हो उठता हूं। यू.एस. में 16-17 साल के बच्चे सुपर बाजार, होटल, रेस्तरां में वेटर या सेल्स का काम अपनी पॉकेटमनी के लिए करते हैं, भारत की तरह परिवार को पालने के लिए नहीं। उनके माता-पिता हजारों डॉलर कमाते हैं, लेकिन वहां का कानून 16 वर्ष के किशोर को वयस्क मानता है, उसे घर से बाहर जाने की अनुमति मिल जाती है।


हमारे देश में बेरोजगारी बडी समस्या है। एक ओर समृद्ध लोग बच्चों को इतना बिगडैल बना देते हैं कि उनकी संवेदनशीलता खो जाती है, दूसरी ओर गरीब बच्चे बुनियादी जरूरतों के लिए भी तरसते हैं। सडकों, फुटपाथों, झुग्गियों, रेलवे प्लैटफॉर्म पर पल रहे बच्चों में कल के होनहार नागरिक छिपे हैं, लेकिन भूख मिटाने के लिए यदि इन्हें बडों जैसे काम करने पडें या भीख मांगनी पडे तो यह आजाद देश के लिए शर्म का विषय है। सर्कस, रिअॅलिटी शो या एड फिल्मों में यदि बच्चों से काम लिया जा रहा है तो यह भी शोषण है। किसी खास प्रोजेक्ट के लिए बच्चों की जरूरत हो, तो भी उनसे 3-4 घंटे से अधिक काम नहीं करवाना चाहिए। मेरे माता-पिता रूपेन और कुमुद बोस ने मुझे सिखाया कि जरूरतमंद बच्चों की हरसंभव मदद करें। पहले मैं एक कंपनी में काम करता था। मैंने सडकों पर पल रहे बच्चों की जिंदगी को नजदीक से देखा। अपने एनजीओ अक्षरा सेंटर के माध्यम से सुनामी पीडित बच्चों, मंदबुद्धि सोसाइटी, ड्रग एडिक्ट बच्चों के लिए काम किया है। सभी बच्चों को तकनीकी शिक्षा देना संभव नहीं। पहले रोटी व प्राथमिक शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों की गारंटी तो हो।

सुबह छह बजे : वेक अप टाइम


रिअॅलिटी शोज के बच्चे भी हैं मजदूर


प्रिया दत्त (सांसद-सामाजिक कार्यकर्ता, मुंबई)


बालश्रम की समस्या पूरे विश्व में है, लेकिन हमारे देश में यह समस्या विकराल है। मुझे खेद है कि वाकई हम इस दिशा में अधिक प्रयास नहीं कर सके। बिहार में बाढ ने तबाही मचा दी, वहां भी बाल मजदूर बढेंगे। कितने भी कानून बनें, जब तक हर व्यक्ति नहीं सोचेगा, बालश्रम खत्म नहीं होगा।


बालश्रम के मूल में कई दूसरी समस्याएं निहित हैं। जिस देश में किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हों, जमीन होने के बावजूद उनके बच्चों को खाना न मिले तो क्या हालत होगी ! आज भी भारत में कई गांव हैं, जहां प्राथमिक पाठशालाएं इतनी बुरी हालत में हैं कि बच्चे वहां पढ ही नहीं सकते। गरीब माता-पिता उन्हें काम पर न लगाएं तो क्या करें!


रिअॅलिटी शोज के बच्चों को भी मैं बाल मजदूर मानती हूं। फर्क सिर्फ स्थितियों का है। अभिभावक व कार्यक्रम संचालक उन्हें सुनहरे सपने दिखाते हैं। शो खत्म होने के बाद कितने बच्चे लाइमलाइट में आते हैं? वे भी दस-बारह घंटे काम कर रहे हैं तो किस कीमत पर? बच्चों को अकादमिक शिक्षा के साथ तकनीकी ज्ञान मिले, मुफ्त शिक्षा कार्यक्रम को व्यापक पैमाने पर शुरू किया जाए तो शायद स्थितिया सुधरें। हमने गरीब बच्चों के लिए नरगिस दत्त मोबाइल हॉस्पिटल शुरू किया है। पीडित बच्चों के लिए हेल्पलाइन की व्यवस्था की। मंदबुद्धि बच्चों के लिए भी संस्था बनाई है। मेरे पापा स्व. सुनील दत्त ने दोस्तों के साथ मिल कर रेड लाइट एरिया के बच्चों को शिक्षा, स्वास्थ्य, एड्स संबंधी जानकारी देने व नशीले पदार्थो के खिलाफ मुहिम छेडी थी, हम उन्हीं कामों को आगे बढाने की कोशिश कर रहे हैं।


शौकिया काम बाल मजदूरी नही


दर्शील सफारी (बाल कलाकार, मुंबई)

मुझे नृत्य में दिलचस्पी थी, मम्मी ने शामक दावर इंस्टीटयूट ऑफ डांस एकेडमी में डांस सीखने भेजा। मैंने पढाई के साथ इस शौक को मजे के लिए किया। मुझे कभी नहीं लगा कि यह बालश्रम है। मेरा मानना है कि स्कूलों में भारी बस्तों और होमवर्क से लदे बच्चे भी बाल मजदूर हैं। मुझे तो टीवी पर कार्यक्रम और विज्ञापन देखना अच्छा लगता है। मम्मी-पापा ने बचपन से मुझे और छोटी बहन नेझवी को सिखाया कि हम अनाथ बच्चों की सहायता करें। सडक पर गुब्बारे, फूल, किताबें बेचते हुए बच्चों के बारे में मां कहती हैं कि वे पेट भरने के लिए यह काम करते हैं, तो मुझे बुरा लगता है।


फिल्मों और रिअॅलिटी शो में बच्चे काम कर रहे हैं, तो इसे बाल मजदूरी कहना ठीक नहीं है।आमिर अंकल को फिल्म तारे जमीं पर के लिए एक 8-9 साल के बच्चे की जरूरत थी। शामक अंकल ने मेरा नाम सुझाया। इस फिल्म के बाद से तो मेरी दुनिया ही बदल गई। हर हफ्ते 2-3 फिल्मों के ऑफर आने लगे, लेकिन मम्मी-पापा ने दो वर्ष तक कोई फिल्म नहीं साइन करने दी। अगस्त में मैंने प्रियदर्शन अंकल की एक फिल्म साइन की है। शूटिंग दो महीने में खत्म करनी है, जिससे मेरी पढाई पर असर नहीं होगा। मुझे रिअॅलिटी शोज में बुलाया जाता है, लेकिन मैं नहीं जाता। बीती जुलाई में मैं बच्चों के ड्रेस बनाने वाली कंपनी ओ.वाई.ओ. का ब्रैंड एंबेसडर बना हूं, इसके लिए मैंने मम्मी-पापा से अनुमति ली। वे जानते हैं कि 8-10 घंटे रोज काम किया जाए तो बच्चे और बडे में क्या फर्क रहेगा? सवाल है रिअॅलिटी शोज का, तो जब तक दर्शक चाहेंगे, वे टीवी पर आते रहेंगे।


दक्षिण एशिया में बालश्रम

भारत : जनगणना (2001) के मुताबिक यहां 1 करोड 20 लाख बाल श्रमिक थे।

बांग्लादेश : वर्ष 1990 के बांग्लादेश सांख्यिकी ब्यूरो श्रम बल सर्वेक्षण के मुताबिक 10 से 14 वर्ष की आयु के 5.7 मिलियन बच्चे कामकाजी थे।

पाकिस्तान : वर्ष 1996 में यहां 40 मिलियन बच्चों में से 5 से 14 वर्ष की आयु के 3.3 मिलियन यानी 8.3 फीसदी बच्चे बाल मजदूरी में रत थे।

नेपाल : तीन मिलियन से अधिक बच्चे यहां कामकाजी हैं।

फिलीपींस : वर्ष 1993 में यूनिसेफ और आईएलओ के अनुसार 5 से 5.7 मिलियन बाल श्रमिक यहां थे।

श्रीलंका : जनगणना तथा सांख्यिकी विभाग ने 1999 में अनुमान लगाया कि यहां 5 से 14 की आयु समूह में 14.9 फीसदी बच्चे अलग-अलग कार्यो में लगे हैं।

इंडोनेशिया : वर्ष 1990 की जनगणना के अनुसार 10-14 वर्ष की आयु समूह के बीच 2.2 मिलियन बच्चे श्रमिक थे।

मलेशिया : आईएलओ के अनुसार वर्ष 2000 में 10 से 14 वर्ष के कामकाजी बच्चों की संख्या 60 हजार थी। यानी इस आयु वर्ग के करीब 2.3 फीसदी बच्चे कार्यरत थे।

कंबोडिया : वर्ष 2001 में राष्ट्रीय सांख्यिकी संस्थान का अनुमान था कि यहां 5 से 14 वर्ष के आयु वर्ग में 44.8 फीसदी बच्चे श्रमिक हैं।

अफगानिस्तान : वर्ष 2002 में आईएलओ के मुताबिक 10 से 14 वर्ष की आयु समूह में 23.8 फीसदी बच्चे काम में लगे थे।

थाइलैंड : आईएलओ ने 1994 में बाल श्रमिकों की संख्या चार मिलियन बताई थी, जिनमें से छह लाख श्रमिकों की आयु 13-14 वर्ष थी। आईएलओ ने वर्ष 2001 में अनुमान लगाया कि यहां 10-14 वर्ष की आयु समूह में 11.5 फीसदी बच्चे कामकाजी थे।

सौजन्य : वी.वी. गिरि राष्ट्रीय श्रम संस्थान, नोएडा (उत्तर प्रदेश)

मैं मुफ्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा के पक्ष में हूं। स्कूलों में हस्तशिल्प की शिक्षा दी जानी चाहिए। उत्पादन बढाने के लिए नहीं, बल्किछात्रों की बौद्धिक योग्यता बढाने के लिए। बच्चों को श्रम के महत्व और उसके सम्मान के बारे में बताया जाए।


महात्मा गांधी (बुनियादी शिक्षा)

इससे जरूरी कोई कर्तव्य नहीं है कि बाल अधिकारों का सम्मान किया जाए। बच्चों केकल्याण को सुनिश्चित किया जाए ताकि उनका जीवन भयरहित हो और वे पूरी तरह शांतिपूर्ण माहौल में पलें-बढें।


कोफी अन्नान (पूर्व महासचिव संयुक्त राष्ट्र)

मैं दुनिया को बदलने के लिए किताबें लिखता हूं। यदि मैं समाज के सबसे निचले तबके के बच्चों को स्कूल, शिक्षक और वैसी सुविधाएं दे सकूं, जो अपने बच्चों को देता हूं तो समझूंगा किमेरा जीवन व्यर्थ नहीं गया।

जोनाथन कोजोल (सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और शिक्षाशास्त्री)

बेरोजगारी को बढा रहा है बालश्रम

कैलाश सत्यार्थी (सामाजिक कार्यकर्ता, बचपन बचाओ आंदोलन, दिल्ली)


ऐसा कोई भी कार्य जो बच्चे के बौद्धिक, शैक्षिक, मानसिक, नैतिक विकास में बाधा पहुंचाए, बालश्रम है। 1986 में बने बालश्रम (उन्मूलन) कानून में कहीं कोई खामी जरूर है। क्योंकि इसमें जोखिम भरे कार्यो को प्रमुखता दी गई है। जबकिऐसी कोई भी स्थिति जिसमें बच्चा आर्थिक कारणों से नौकरी कर रहा है, बालश्रम है।


केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री रेणुका चौधरी कहती हैं कि रिअॅलिटी शोज में काम करने वाले बच्चे भी बाल श्रमिक हैं। मेरा मानना है कि ऐसे शो उपभोक्तावादी संस्कृति को बढावा दे रहे हैं। बच्चों की खुशी, आंसू, हंसी को बेचा जा रहा है। कार्यक्रमों के संचालक कहते हैं कि वे प्रतिभाओं को मंच दे रहे हैं। लेकिन 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों को चकाचौंध में लाकर हम उनकी आंखों में ऐसे सपने भर दे रहे हैं, जो भविष्य में मालूम नहीं क्या शक्ल लेंगे। यह बाजारवाद है।


1980 में बचपन बचाओ आंदोलन शुरू किया गया था। 1999 में बालश्रम पर एक अंतरराष्ट्रीय कानून बना। मैं बाल श्रम को बेरोजगारी से जोड कर देखता हूं। देश में साढे छह सौ करोड वयस्क बेरोजगार हैं। यदि भारत में छह करोड बच्चों से काम कराया जाता है तो उनके माता-पिता बेरोजगार होते हैं। मेरा मानना है कि गरीबी के कारण बालश्रम नहीं बढ रहा, बल्कि बालश्रम के कारण गरीबी बढ रही है। बडों को काम नहीं मिल रहा, छोटे बच्चों को कम पैसे पर काम कराया जा रहा है।


सूचना और ज्ञान के तंत्र में बुनियादी चीज है कि हर बच्चे को अच्छी शिक्षा मिले। जबकि भूमंडलीकरण के दौर में शिक्षा की राह में बालश्रम बडी बाधा है। इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय समिति बनी है, जिसमें बच्चों को समानता आधारित उपयोगी शिक्षा पर बल दिया जा रहा है। हाशिये से बाहर के बच्चों को मुख्यधारा से जोडने की कोशिश की जा रही है। पूरी दुनिया में मुफ्त शिक्षा अभियान चलाया गया है। स्थितियां बदली हैं और बदलेंगी। हमें उम्मीद है कि बचपन को हम बचा सकेंगे।


बालश्रम का विकल्प भी तलाशें

एनेक्सी शाह (सामाजिक कार्यकर्ता, मुंबई)

कानून कहता है कि बालश्रम अपराध है। समाज भी यही मानता है। लेकिन बच्चे काम न करें तो क्या करें? उन्हें यदि हम काम से हटाएंगे तो क्या उनका पेट भरेगा? क्या कोई वैकल्पिक व्यवस्था ऐसी है कि बच्चे काम न करें, शिक्षा भी हासिल करें और भूखे भी न रहें?


मैंने ऐसे 200 बच्चों को एक संस्था के तहत अपने पास रखा है। ये बच्चे पहले काम करते थे। अब हमारे यहां पढते हैं। अपने काम से वे जितना कमाते थे, संस्था उन्हें उतना पैसा दे देती है, ताकि उनके अभिभावकों को किसी प्रकार की आपत्ति न हो। यही वजह है कि बच्चे अब यहां पढ रहे हैं। मैं चाहती हूं कि सरकार सिर्फ कागज पर बडी-बडी बातें न करके कुछ ठोस कदम उठाए और उन बच्चों के परिवार को आर्थिक मदद दे। बच्चों के लिए भरपेट खाने का बंदोबस्त करे।


मैंने जब पहली बार बच्चों के लिए काम करना शुरू किया तो लोगों ने कहा कि बच्चों की जिंदगी सुधर ही नहीं सकती। यह मुश्किल ही नहीं, असंभव कार्य है। लेकिन मैंने हार नहीं मानी। मैं उन्हें राह पर ले आई। हम छह वर्ष की आयु से ही बच्चों को शिक्षा देना शुरू करते हैं, क्योंकि यहीं से भविष्य की नींव पडने लगती है। देश में म्युनिसिपल स्कूल हैं, लेकिन शिक्षक नहीं हैं। सरकारी शिक्षा फंड कहां जाता है, इसका जवाब किसी के पास नहीं है।

एक बार आ जाने के बाद आप यहां से नहीं जाएंगे


अब बात करें यदि रिअॅलिटी शो की तो मेरा मानना है कि ये बहुत हानिकारक हैं। जो बच्चे जीत जाते हैं, उन्हें तारीफ मिलती है-पैसा मिलता है, जो नहीं जीत पाते-वे कहां जाते हैं? कितनी कुंठाओं में जीते हैं? ये बच्चे महीनों घर से दूर रहते हैं और जब वे कक्षा में आते हैं तो उन्हें उत्तीर्ण कर दिया जाता है। क्या इन्हीं तरीकों से कल्याणकारी और उपयोगी शिक्षा की अवधारणा सफल होगी? लोग इसलिए रिअॅलिटी शोज का विरोध नहीं करते, क्योंकि इनमें संभ्रांत परिवारों के बच्चे भी जाते हैं। यह बाल मजदूरी और बालश्रम से भी ज्यादा हानिकारक चीजें हैं। बाल श्रमिकों की आर्थिक स्थिति ठीक करें, उन्हें भोजन की गारंटी दे। स्कूलों में कर्तव्यपरायण शिक्षकों की व्यवस्था करें, उन्हें वेतन समय पर दें। शिक्षा को उपयोगी बनाएं, ताकि बच्चा बडा होकर अपनी राह खुद चुन सके। बच्चों में नैतिकता का विकास कराएं, उन्हें श्रम व पैसे के महत्व के बारे में बताएं, ताकि वे गलत कार्यो की ओर न बढें। बालश्रम की दिशा में ये प्रयास जरूरी हैं।




Tags:                         

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (2 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

3 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Daisy के द्वारा
June 11, 2016

DPUTiger was talking about the sheep feet and silly (almost stupid) put up it has. It really is728#&1n;t enough for a pair of normal socks and may even be pushing it for a pair of ankle socks. I suspect you will definitely need 2 for a pair.

jaisila bajaj के द्वारा
October 28, 2012

it was a long and great article.very nice.

सुनिल के द्वारा
September 15, 2012

बच्चों का यह संसार बहुत ही प्यारा और सुंदर है. काश की इस संसार को बाल श्रम से दूर और शिक्षा के पास लाया जा सकता.


topic of the week



latest from jagran