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किशोर उम्र का वो नाजुक मोड़......!!!

Posted On: 13 Sep, 2012 मेट्रो लाइफ में

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किशोर उम्र के बदलावों में सबसे अहम हैं शारीरिक बदलाव। अचानक होने वाले बदलावों को मन स्वीकार नहीं कर पाता। किसी से शेयर करने में हिचक होती है, लगता है मानो सारी आजादी छिन गई हो। लडकों-लडकियों में अलग-अलग तरह के बदलाव होते हैं। यही वह उम्र भी है, जब मानसिक-भावनात्मक और बौद्धिक विकास की प्रक्रिया गति पकडती है। मन किसी एक बात पर ठहर नहीं पाता और दिमाग सवालों से भर उठता है।


youthsउम्र का अजीब खेल

1. मन में कई सवाल पनपने लगते हैं। क्यों? कब? कहां? ऐसे प्रश्न इसी उम्र में जन्मते हैं।

2. आजादी पर थोडा भी प्रतिबंध उन्हें बाधक लगता है। वे स्कूल के नियमों और माता-पिता के आदेशों को चुनौती देने लगते हैं।

3. अपने ढंग से चीजों को सही-गलत और अच्छा-बुरा समझने की बुद्धि आ जाती है। यह सामान्य-सहज प्रक्रिया है।

4. प्री-टीन और टीनएज में अचानक एहसास होने लगता है कि हम कुछ भी कर सकते हैं और जो करेंगे, वह गलत नहीं होगा। यह एक बडा बदलाव होता है, जो माता-पिता के लिए मुश्किलें खडा करता है।


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5. खुद को आकर्षक महसूस करने लगते हैं टीनएजर्स। खास तौर पर लडकियों में आईने में खुद को निहारना, सौंदर्य प्रसाधनों का प्रयोग, ड्रेसेज को लेकर सजगता जैसे तमाम गुण इसी उम्र में पनपते हैं।

6. दोस्तों के साथ घंटों समय बिताने, फोन करने और माता-पिता से कुछ छिपा लेने की मानसिकता भी इसी उम्र की देन है।

7. मूड स्विंग, भावनात्मक उथल-पुथल, अनावश्यक रुलाई जैसे लक्षण भी हार्मोनल बदलाव के कारण होते हैं।

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मुश्किल है बहुत फिर भी

बच्चों का टीनएज में आना माता-पिता के लिए एक साथ कई मुश्किलें खडी करता है। इस उम्र में किशोर अपनी रचनात्मकता के शीर्ष पर होते हैं, लेकिन अगर चूक हो जाए तो विध्वंसक होने में भी देर नहीं लगती। ऐसी स्थिति में माता-पिता को किशोर मनोविज्ञान के इन तथ्यों को जरूर ध्यान में रखना चाहिए-


1. आम तौर पर किशोरों के लिए शारीरिक बदलावों को समझ पाना मुश्किल होता है। वे चिडचिडे हो जाते हैं, साथ ही साथियों के साथ अपने बदलावों की तुलना करके वे और भी चिंतित हो जाते हैं। उन्हें समझाएं कि आप भी इसी तरह बडे हुए थे और इसमें असामान्य कुछ भी नहीं। उन्हें अपने अनुभव सुनाएं।



2. उनके शारीरिक बदलावों, खास तौर पर वजन बढने-घटने को लेकर उन्हें ताने न दें।


3. अगर बढते बच्चे ज्यादा प्रतिक्रियावादी हो जाएं, हर बात पर जवाब देने लगें तो बजाय उन्हें सजा देने के, उनकी बातों को ध्यान से सुनें और उनके स्तर पर जाकर उनके तर्को को समझने की कोशिश करें।


कबूतर और चूहे की दोस्ती …!!!


4. छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करना सीखें। उनकी ड्रेसेज, हेयर स्टाइल्स पर कमेंट करने के बजाय यह ध्यान दें कि उनका सर्किल कैसा है। दोस्त गलत दिशा में तो नहीं ले जा रहे! यानी छोटे बदलावों के बजाय जो बडे प्रश्न हैं, उन्हें सुलझाने की कोशिश करें।


5. उन्हें जिम्मेदारियां सौंपें। अपने छोटे-छोटे निर्णय खुद लेने को प्रोत्साहित करें, ताकि वे अपनी योग्यता साबित कर सकें।


6. यदि आपको लगता है कि वे नियंत्रण से बाहर हो रहे हैं, दोस्तों के साथ ज्यादा वक्त बिता रहे हैं तो उनसे दोस्तों को घर लाने को कहें। हमउम्र दोस्तों की तरह व्यवहार करें। जरूरत पडे तो मनोवैज्ञानिक की राय भी लें।


7. दूसरे अभिभावकों के अनुभवों का फायदा उठाएं। उनसे पैरेंटिंग टिप्स लें।


पारिवारिक मसला


1. 90 फीसदी अवसादग्रस्त किशोर घरेलू विवादों के चलते परेशान होते हैं। हालांकि उन्हें झगडे का कारण नहीं पता होता।


2. 46 फीसदी अवसादग्रस्त टीनएजर अच्छे से अच्छा परिणाम लाने के माता-पिता के दबाव से परेशान हैं।


3. 50 फीसदी इसलिए अवसाद में हैं, क्योंकि उनके अभिभावक उनकी जिंदगी के हर पहलू को नियंत्रित करना चाहते हैं।


स्त्रोत : बाल एवं किशोर मनोरोग चिकित्सालय, एम्स (दिल्ली)


मुझे स्कूल नहीं जाना


आज मुझे स्कूल नहीं जाना, मुझे स्कूल अच्छा नहीं लगता। मुझे बोरियत हो रही है, रोज-रोज जाना जरूरी है क्या?

प्राइमरी कक्षा में ही नहीं, सीनियर कक्षाओं में भी बच्चे कई बार ये शिकायतें करते नजर आते हैं। बोरियत कभी-कभार सभी को होती है। लेकिन जब बच्चे रोज स्कूल न जाने के बहाने बनाएं और कहें कि बोर हो रहे हैं तो उनकी शिकायतों पर ध्यान देना जरूरी है। ऐसा कई कारणों से हो सकता है।


अच्छा नहीं लगता स्कूल

1. एकाएक मौज-मस्ती की दुनिया से गंभीरता की ओर कदम बढना पहला कारण हो सकता है। उन्हें समझाना जरूरी है कि जीवन मौज-मस्ती का ही नाम नहीं। हमेशा अपनी इच्छा से कार्य करें, यह संभव नहीं। कुछ काम इच्छा के खिलाफ भी करने होते हैं, क्योंकि वे हमारे हित में होते हैं। जैसे बीमार होने पर दवा लेना।


2. विषय समझ में न आ रहा हो, टीचर्स या सहपाठियों के साथ तालमेल न बैठ रहा हो या कोई अन्य कारण हो। माता-पिता को अपने टीनएजर्स को भरोसे में लेकर उनके स्कूल न जाने की वजह पूछनी चाहिए, साथ ही शिक्षकों से भी मिलना चाहिए।


कुछ खास हूं मैं

कई बार विशेष स्वभाव वाले टीनएजर्स स्कूल में बोरियत की शिकायत करते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि कुछ छात्र स्कूल के बने-बनाए ढर्रे के अनुसार काम नहीं कर पाते। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि वे पढाई में अच्छे नहीं हैं। हो सकता है कि वे होमवर्क न कर पाते हों, गलतियां करते हों, लेकिन क्लास टेस्ट में बेहतर कर सकते हैं। कोर्स से थोडा अलग सवालों के जवाब भी वे दे सकते हैं। इस प्रवृत्ति के टीनएजर कुछ ऐसा करते हैं-


1. कम पढने के बावजूद औसत या अच्छे ग्रेड से उत्तीर्ण होते हैं।

2. उनका काम व्यवस्थित नहीं होता। मसलन उनकी हैंडराइटिंग खराब हो सकती है, जिसे सुधारने के प्रति उनकी इच्छा भी नहीं दिखती।

3. ऐसे विषयों में अचानक रुचि लेना बंद कर देते हैं, जिनमें पहले उनकी रुचि रही हो।

4. प्रोजेक्ट और एसाइनमेंट्स के जरिये उन्हें विषय ज्यादा समझ में आता है।

5. रीडिंग के लिए कहने पर इतनी तेजी से पढते हैं कि दूसरे छात्रों की समझ में न आए। डर लगता है प्रोजेक्ट से


कई छात्रों को विषय ही समझ में नहीं आता। हालांकि वे होमवर्क नियमित करते हैं, सीधे सवालों के जवाब भी देते हैं, लेकिन प्रोजेक्ट्स या परीक्षा में गडबड कर सकते हैं। विषय से अलग या घुमाकर सवाल देने पर इन्हें परेशानी होती है। शिक्षक से मिलकर जानने की कोशिश करें कि क्या वे शुरू से ऐसे हैं या कुछ समय से उनमें बदलाव आ रहा है, क्योंकि तभी आप समस्या को समझ सकेंगे। सामान्यत: शिक्षक ही इसका निदान कर सकते हैं, लेकिन कई बार मनोवैज्ञानिक सलाह की जरूरत पड सकती है।


चाहिए शिक्षक का ध्यान


कई टीनएजर्स को हर कदम पर प्रोत्साहन की जरूरत पडती है। शिक्षक यदि व्यक्तिगत तौर पर इन पर ध्यान दें तो वे अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं। इसके विपरीत ऐसा न होने पर इन्हें बैक बेंचर होने में देर नहीं लगती। ऐसे छात्र प्राथमिक कक्षाओं में बेहतर होते हैं, लेकिन बडी कक्षाओं में जाकर पिछडने लगते हैं। क्योंकि यहां उनके दोस्त, सहपाठी और शिक्षक अलग हो जाते हैं।



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मुश्किल में हैं किशोर


स्कूल जाने वाले 10-12 फीसदी बच्चों को स्वास्थ्य और व्यवहार संबंधी कई गंभीर समस्याएं हैं। उन्हें इलाज की जरूरत है।


आईसीएमआर (इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च) और डब्लूएचओ (व‌र्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन)


1. 90 फीसदी किशोर स्कूल से भागते हैं

2. 70 प्रतिशत में तनाव, मूड स्विंग, व्यर्थता बोध जैसे लक्षण पनप रहे हैं।

3. 40 से 50 फीसदी को सिर दर्द, वजन संबंधी समस्याएं पैदा हो रही हैं।

4. 43 प्रतिशत को परीक्षा भय सताता है।

5. 40 फीसदी किशोर सिब्लिंग राइवलरी से त्रस्त हैं।

6. 36 फीसदी छात्र स्कूल से परेशान हैं।

7. 20 प्रतिशत सजा से घबराते हैं।

8. 17 फीसदी माता-पिता की टोकने की आदत से परेशान हैं।

स्त्रोत : बाल एवं किशोर मनोरोग चिकित्सालय, एम्स (दिल्ली)



दोस्तों का दबाव

पियर प्रेशर का अर्थ है हमउम्र सहपाठी, साथी या समूह द्वारा व्यवहार, नजरिए और मूल्यों को बदलने का दबाव। यह हर उम्र के लोगों पर होता है, लेकिन टीनएज में यह दबाव सर्वाधिक होता है। यह उम्र है, जब युवा होते सपनों को पंख फैलाने की इच्छा जागने लगती है। कई बार वे दोस्तों की नकल करने लगते हैं। उनकी तरह कपडे पहनने, एक्सेसरीज खरीदने से लेकर उनके बोलने तक की स्टाइल को कॉपी करना उनका फितूर बनने लगता है। इसमें कुछ अस्वाभाविक भी नहीं है। यह उम्र का सहज बदलाव है। बस माता-पिता को ध्यान रखना पडता है कि उनके बडे हो रहे बच्चे कहीं अपनी मौलिकता को पूरी तरह खत्म न कर दें।


कई बार टीनएजर्स खुद को दोस्तों की जमात में फिट नहीं पाते और अकेलेपन से ग्रस्त होने लगते हैं। उन्हें लगता है, वे कुछ अलग हैं। कभी हीनता तो कभी श्रेष्ठता-भावना के चलते वे दोस्तों के साथ मिक्स-अप नहीं हो पाते। ब्रूस ए. एप्सटीन पियर प्रेशर पर लिखी गई अपनी पुस्तक में लिखते हैं, हमउम्र साथियों के साथ जुडाव बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए जरूरी है। खास तौर पर टीनएजर्स के लिए, जबकि उनमें माता-पिता से अलग एक स्वतंत्र चेतना आकार लेने लगती है।


रोल मॉडल होते हैं दोस्त


पियर प्रेशर का प्रभाव टीनएज में बहुत पडता है। इसके सकारात्मक प्रभाव में उन्हें अपनी जिम्मेदारियों का एहसास होता है। वे पढाई के साथ-साथ रचनात्मक गतिविधियों में भागीदारी करने लगते हैं, उनकी रुचियां परिष्कृत होने लगती हैं, क्योंकि साथी उनके रोल मॉडल होते हैं। नकारात्मक प्रभाव उन्हें गलत कार्यो की ओर प्रेरित करता है। इसमें क्लास छोडना, ड्रग्स या सिगरेट की लत पडना, ईव टीजिंग, ग्रुप बनाकर टीचर्स या अन्य सहपाठियों को डराना-धमकाना जैसी तमाम बुरी आदतें उन्हें घेरने लगती हैं। जाहिर है, ऐसा वे बडे यानी सीनियर साथियों से प्रभावित होकर करते हैं।


दोस्तों से सर्वाधिक प्रभावित होते हैं 12 से 15 वर्ष की आयु वाले टीनएजर। शोध बताते हैं कि ऐसे बच्चे भी दोस्तों के प्रभाव में जल्दी आते हैं, जिन्हें घर में कम सपोर्ट मिलता है। घर में प्यार न मिलने पर बच्चे उसे बाहर तलाशने लगते हैं। उनकी भावनात्मक असुरक्षा का फायदा चालाक छात्र उठा लेते हैं।


क्या करें अभिभावक


1. अभिभावक होने के नाते अपने किशोरों का मार्गदर्शन करना आपका दायित्व है। याद रखें, वे कभी उन मूल्यों को नहीं छोडेंगे, जो बचपन से उन्हें दिए गए हैं। फिर भी जरूरी है कि आप पियर प्रेशर के बारे में उन्हें समझाएं।

2. आमंत्रित करें। यदि वे नकारात्क प्रवृत्ति वाले नजर आते हैं तो अपने बच्चों को इस बारे में सचेत करें।

3. बच्चों को न कहना सिखाएं। यदि उनका कोई दोस्त जबरन ऐसा कार्य करवाना चाहता है, जिसे वे नहीं करना चाहते तो अच्छा होगा कि वे उदारतापूर्वक न कह दें। यदि सीधे बोलने में उन्हें हिचक हो तो नहीं, धन्यवाद, मुझे जाना चाहिए.. जैसे वाक्य बोल सकते हैं। बच्चों को सिखाएं कि साथियों या सीनियर लडकों के गलत दबाव से कैसे बचें।

4. किशोरों के व्यवहार में किसी अप्रत्याशित बदलाव को नजरअंदाज न करें। उनके दोस्तों के बारे में अवश्य जानकारी हासिल करें और टीचर्स से मिलें। हो सकता है, वे किसी गलत समूह के दबाव में आ रहे हों।

5. उनसे मित्रवत व्यवहार करें। उनके साथ सहज और खुला व्यवहार रखें, ताकि वे आपसे हर बात शेयर कर सकें। उनसे कभी ऐसी उम्मीदें न रखें, जिन्हें वे पूरा न कर सकें।

6. उनकी रचनात्मक गतिविधियों को बढावा दें। पुस्तकें पढने, संगीत सुनने, कलात्मकगतिविधियों में हिस्सा लेने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करें।

7. उनसे कोई गलती हो जाए तो सजा देने के बजाय उन्हें समझाएं और बताएं कि किस तरह के साथियों से वे दूर रहें। उन्हें सिर्फ यह न बताएं कि यह कार्य गलत है, बल्कि वह कार्य क्यों गलत है, यह भी जरूर बताएं। तभी वह सकारात्मक ढंग से सोच सकेंगे।



पेरेंटिंग टिप्स

1. बातें गंभीरता से सुनें। घर में ऐसा माहौल बनाएं कि वे खुलकर अपनी बात कह सकें। उनके दोस्तों-सहपाठियों की जानकारी अवश्य रखें।

2. क्रिकेट, फुटबाल, बैडमिंटन, हॉकी जैसे खेलों में उनकी भागीदारी बढाएं। इसके अलावा नृत्य, संगीत, पेंटिंग जैसी कलाओं में उनकी रुचि जगाएं, अच्छी पुस्तकें पढने को दें।

3. उनके दृष्टिकोण को भी महत्व दें। अपने अहं के चलते बच्चों को हथियार के बतौर न इस्तेमाल करें।

4. बच्चों के पहले रोल मॉडल माता-पिता ही होते हैं। उनके सामने कभी न झगडें।

5. बात-बात पर बढते बच्चों को न टोकें। उन्हें कठोर सजा देने से भी बचें।

डॉ.ज्योति (काउंसलर, सालवान स्कूल, दिल्ली)

कलम वाले हाथों में हथियार!


कुछ समय पूर्व गुडगांव (हरियाणा) के एक नामी स्कूल में दो छात्रों के बीच झगडा इतना बढा कि एक ने दूसरे की गोली मारकर हत्या कर दी। एक अन्य स्कूल के दो लडकों के बीच हुई लडाई में एक ने दूसरे के पैर में चाकू से इतने वार किए कि वह मर गया। सवाल यह है कि आखिर पेन-पेंसिल और बॉल पकडने वाले हाथों में पिस्तौल, चाकू और हथियार क्यों? किशोर उम्र में बढती हिंसा और आक्रामकता के कुछ कारण इस तरह हैं-



घरेलू माहौल

संयुक्त परिवारों के कम होने और एकल परिवारों के बढने का सबसे बुरा प्रभाव किशोरों पर ही पडा है। अधिकतर माता-पिता कामकाजी हैं। सुख-सुविधाएं बढी हैं, लेकिन समय की कमी है। दादा-दादी के पास बैठकर शिक्षाप्रद कहानियां सुनने की बातें खुद ही किस्सा बन गई हैं। मोबाइल-टीवी के शोर में संवाद की गुंजाइश और कम होती जा रही है। बच्चे खुल कर माता-पिता या बडे, बहन-भाइयों को अपनी समस्याएं नहीं बता पाते, अकेले ही उससे जूझते रहते हैं। समाधान न मिलने पर अपनी खीज और गुस्से को दूसरों से मारधाड या तोड-फोड के रूप में प्रकट करते हैं। आजकल माता-पिता अपने बच्चों की हर उचित-अनुचित मांगें पूरी करने लगते हैं, जो गलत है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि सभी सुख-सुविधाएं आसानी से मिल जाने के कारण भी उनकी सहनशक्ति और संघर्ष क्षमता कम होती जा रही है। इसलिए किशोरों की मांगें पूरी जरूर करें, लेकिन उन्हें यह एहसास भी बीच-बीच में कराएं कि अनुचित मांगों को नहीं पूरा किया जाएगा।

दबाव झेलते किशोर

माता-पिता की अपेक्षाएं बच्चों से बहुत बढ गई हैं। कई बार उन्हें पूरा न कर पाने का दबाव, मित्रों से प्रतिस्पर्धा, ईष्र्या, दोस्तों से झगडा या उनसे न मिल पाने जैसे कई दबाव उन्हें झेलने पडते हैं। किशोरों पर सबसे बडा दबाव है आधुनिक और पाश्चात्य जीवनशैली के साथ परंपरागत पारिवारिक मूल्यों का तालमेल बैठाना। अजीब से संक्रमण काल से गुजर रहे हैं टीनएजर्स। उनकी समस्याएं सुलझाना तो दूर, आजकल माता-पिता के पास धैर्यपूर्वक उन्हें सुनने तक की फुर्सत नहीं है।



स्कूलों में बढता व्यवसायीकरण

कभी गुरु-शिष्य का संबंध मिसाल हुआ करता था। समय के साथ स्थितियां उलट गई। स्कूल व्यावसायिक केंद्रों में तब्दील हो गए हैं। बच्चों में नैतिक मूल्यों की शिक्षा देने का कर्तव्य अब शिक्षकों का नहीं रहा। अध्यापकों का रूखा व्यवहार और छोटी-छोटी गलतियों पर कडी सजा देना किशोर छात्रों को क्रोधी बना देता है। इन हिंसक प्रवृत्तियों को सुधारने की दिशा में कोई सार्थक प्रयास भी नहीं हो रहा।

सविता स्याल (पूर्व प्रधानाचार्या वसंत बैली पब्लिक स्कूल, गुडगांव, हरियाणा)




मीडिया भी बना रहा है हिंसक

पिछले दो दशकों में किशोर उम्र के लडके-लडकियों पर हुए अध्ययन बताते हैं कि टीवी पर आने वाले हिंसक कार्यक्रमों का उन पर घातक असर पडता है। हिंसक छवियों का टीनएजर्स पर इस तरह प्रभाव पडता है:


1. ऐसे कार्यक्रमों में स्त्री को हमेशा निरीह भुक्तभोगी के बतौर दिखाया जाता है। लडकियों के मन में भय पैदा होता है। उन्हें लगता है कि उनके इर्द-गिर्द का समाज बहुत दूषित है। उनके मन में समाज की नकारात्मक छवि रच-बस जाती है।


2. कार्टूस भी किशोरों को हिंसक बना रहे हैं। एक ओर जहां उनकी भाषा-शैली गलत प्रभाव डाल रही है, वहीं दूसरी ओर स्टंट दिखाने वाले कई धारावाहिक और उनके करामाती चरित्र बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहे हैं। उन्हें लगता है कि वे भी इतने ही बलशाली और ताकतवर हो सकते हैं।


3. अध्ययन बताते हैं कि ज्यादा टीवी देखने वाले बच्चों के स्कूल प्रदर्शन और उनकी याददाश्त क्षमता पर भी नकारात्मक प्रभाव पडता है। वे चिडचिडे हो रहे हैं। स्कूल के बाद बचे समय में पुस्तकों, शारीरिक गतिविधियों, संगीत, प्रकृति के सान्निध्य में या अन्य रचनात्मक कार्यो में खर्च होने वाला समय टीवी ले रहा है।


4. टेलीविजन एडिक्शन शीर्षक से एक मैगजीन में प्रकाशित लेख के अनुसार, टीवी दर्शकों को अपना आदी बना लेता है। रिमोट में स्विच ऑफ के विकल्प के बावजूद लोगों पर अनावश्यक चैनल्स बदलने की खब्त सवार रहती है।


5. शोध बताते हैं कि 15 मिनट खेलने केबाद आपको अपने भीतर ऊर्जा महसूस होती है, लेकिन टीवी महज आंखों में जलन और थकान का अनुभव कराता है। अमूमन किशोर दिन के दो से तीन घंटे टीवी के आगे बिताते हैं, जिससे न सिर्फ उनकी मानसिक स्थिति पर कुप्रभाव पडता है, बल्कि उनका स्वास्थ्य भी बहुत प्रभावित होता है।


6. अध्ययनों के अनुसार, मीडिया में जिस तरह रक्तरंजित और सनसनीखेज खबरों का दौर चल निकला है, उसका टीनएजर्स पर नकारात्मक प्रभाव पड रहा है। वे समय से पूर्व परिपक्व हो रहे हैं। उन्हें बडी से बडी घटना भी महज एक खबर लगती है। टीवी उनकी संवेदनशीलता खत्म कर रहा है।


7. अकेले टीवी देखना ज्यादा हानिकारक है। बडे होते बच्चे अपनी सहज बुद्धि के अनुसार दृश्यों का अर्थ निकालते हैं। माता-पिता साथ बैठकर टीवी देखें, उन्हें चीजों का मर्म समझाएं तो किशोरों के मन में सही संदेश जा सकता है।


डॉ. जितेंद्र नागपाल (वरिष्ठ सलाहकार, बाल मनोविज्ञान, दिल्ली)


हमें भी चाहिए अपना कोना

किशोर उम्र तक पहुंचते-पहुंचते अचानक बच्चों की दुनिया बडी होने लगती है। उनके भीतर स्व की भावना आने लगती है। वे माता-पिता के सामने खुलकर कुछ बोलने में हिचकने लगते हैं, इसके विपरीत दोस्तों के साथ समय बिताने की उनकी इच्छा बढने लगती है। व्यक्तित्व विकास के लिए उन्हें इतनी आजादी देनी जरूरी भी है।


तलाश अपने वजूद की

यह वह दौर है, जहां एक ओर बचपन छूटने का अफसोस होता है, वहीं युवावस्था में पहुंचने की उत्सुकता रहती है। तेजी से हो रहे शारीरिक-मानसिक विकास के साथ ही हार्मोन संबंधी बदलाव भी आ रहे होते हैं। वे खुद को भी नए सिरे से पहचानने की कोशिश कर रहे होते हैं। अपनी पसंद और रुचि से जुडे कार्य अपने ही ढंग से करना चाहते हैं। मेरा सामान, मेरे दोस्त, मेरे खिलौने जैसे एहसास उनके मन में एक खास अधिकार भावना जगा रहे होते हैं। वे छोटी-छोटी चीजों को प्यार से संभाल कर रखना सीख जाते हैं और जब कोई दूसरा व्यक्ति उनकी चीजों को छूता है तो वे नाराज हो जाते हैं। उनमें शीघ्र ही बडों की तरह दिखने और व्यवहार करने की तीव्र आकांक्षा भी जाग उठती है।


जरूरी है थोडा अकेलापन

यह सहज बदलाव है कि इस उम्र में बच्चे माता-पिता और परिवार से थोडा कटा हुआ महसूस करते हैं और उन्हें कुछ वक्त अकेले अपने साथ बिताना अच्छा लगने लगता है। किशोरों के व्यक्तित्व विकास में निजता की भावना (पर्सनल स्पेस) का महत्वपूर्ण योगदान होता है। यही वह समय है, जब उन्हें अपने वजूद का एहसास होता है। उन्हें अपने बारे में सोचना अच्छा लगता है, उनकी कल्पनाओं के पंख फैलने लगते हैं। रचनात्मक अभिरुचि वाले बच्चे इसी उम्र में अकेले बैठकर पेंटिंग करने और कविताएं-कहानियां लिखने की कोशिश करते हैं। इसलिए बौद्धिक विकास के लिए थोडा पर्सनल स्पेस बच्चे के लिए फायदेमंद साबित होता है।


दरअसल यह विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से उनके स्वतंत्र व्यक्तित्व का निर्माण हो रहा होता है। इसलिए किशोर उम्र में यह जरूरी है कि अपने बच्चों को थोडा पर्सनल स्पेस दें।


विनीता


मनोवैज्ञानिक सलाह


पर्सनल स्पेस बच्चों के विकास के लिए बहुत जरूरी है। एक उम्र के बाद उनकी निजता और एकाकीपन का सम्मान भी किया जाना चाहिए, लेकिन इसके साथ अभिभावकों को इन बातों का ध्यान रखना चाहिए :


1. पर्सनल स्पेस का इस्तेमाल वे कैसे कर रहे हैं। अगर कभी उनकी गतिविधियां संदिग्ध नजर आएं तो सावधान हो जाएं और निगरानी रखें।


2. टीनएजर बच्चे के दोस्तों के बारे में जानकारी रखें। उन्हें घर पर बुलाएं, ताकि पता चल सके कि आपके बच्चे किससे और क्यों मिल रहे हैं। उनके करीबी दोस्तों के बारे में पूरी जानकारी रखें।


3. मोबाइल आज सबकी जरूरत बन चुका है। इसका सर्वाधिक उपयोग तो टीनएजर ही कर रहे हैं। मोबाइल उन्हें जरूर दें, लेकिन ध्यान रखें कि वे लंबी बात न करें। बेहतर हो कि उन्हें प्रीपेड रिचार्ज कूपन दिलाएं। रात में उनका सेट अपने पास रख लें।


4. कभी-कभी उनका मोबाइल अपने पास रखें या उनके कॉल्स खुद अटेंड करें, ताकि उनके दोस्तों और गतिविधियों के बारे में सही जानकारी मिल सके।


5. उनके बेडरूम में टीवी या कंप्यूटर न रखें। अगर कंप्यूटर हो तो रात में इंटरनेट कनेक्शन हटा दें, क्योंकि उत्सुकतावश बच्चे इंटरनेट का गलत इस्तेमाल कर सकते हैं।


6.बेडरूम की सफाई खुद करें। उनके वार्डरोब, बुकशेल्फ पर अवश्य नजर डालें। यदि उनके कमरे में कोई आपत्तिजनक वस्तु मसलन, सिगरेट, शराब जैसी चीजें मिलती हैं तो उन्हें डांटने के बजाय अपना व्यवहार संयत रखें और प्यार से उन्हें इन तमाम चीजों के खतरों और साइड-इफेक्ट के बारे में समझाएं।


7. आजकल माता-पिता किशोर होते बच्चों से दोस्ताना व्यवहार करते हैं। यह उचित भी है। लेकिन यह भी ध्यान रखें कि कभी-कभी उनके मन में अभिभावकों का भय या दबाव भी बनाए रखना जरूरी है। यह भय इतना हो कि वह कुछ भी गलत करने से पूर्व एक बार अवश्य सोच लें।


8. अंत में एक जरूरी सलाह कि टीनएजर्स की गतिविधियों पर नजर जरूर रखें, लेकिन इस तरह कि उन्हें यह महसूस न हो कि आप उनकी जासूसी कर रहे हैं। बात-बात पर उन्हें रोकना-टोकना भी ठीक नहीं।


डॉ.जयंती दत्ता (वरिष्ठ मनोविश्लेषक, दिल्ली)





गैजेट्स की दुनिया में टीनएजर

कोई नया गैजेट बाजार में आया नहीं कि वह आपके किशोरों के पास होता है, या उनकी मांग शुरू हो जाती है। कई बार तो बच्चे ही आपको उसकी जानकारी देते हैं। ऐसा सिर्फ आपके ही साथ नहीं, दूसरे पेरेंट्स के साथ भी होता है। सिर्फ उन्हें छोडकर जो व्यावसायिक या किसी अन्य वजह से गैजेट्स के बाजार से जुडे हैं। बाकी लोग नई इलेक्ट्रॉनिक चीजों के बारे में थोडी ही जानकारी रखते हैं।


थोडा पीछे मुडकर देखें तो उन दिनों भी ऐसा ही होता था जब आप किशोर थे। कई ऐसी चीजें होती थीं, जिनके बारे में आपके माता-पिता बाद में जानते थे और आप पहले। फर्क सिर्फयह है कि तब इसकी गति थोडी कम थी। क्योंकि उन दिनों विज्ञान और तकनीक का बाजार इतनी तेजी से तरक्की नहीं कर रहा था। हर महीने नई चीजें बाजार में नहीं आ जाती थीं। उन दिनों इतनी आजादी और सुविधा भी नहीं थी कि आप जब जो चाहें हासिल कर लें।


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नया जानने की जिज्ञासा

नया जानने और हासिल करने की चाह ही आपको आगे बढने और कुछ कर गुजरने के लिए प्रेरित करती है। लेकिन चाह की दिशा कैसी हो, यह तय करना जरूरी है।


यह सही है कि आज बाजार में एक हजार से लेकर लाखों रुपये मूल्य तक के मोबाइल उपलब्ध हैं। ऊंचे दाम वाले आईफोन, आईपॉड और तमाम तरह के सॉफ्टवेयर्स एवं सुविधाओं से युक्त कंप्यूटर हैं। थ्री जी यानी तीसरी पीढी के मोबाइल फोन पुराने हो चुके हैं। नई पीढी की दिलचस्पी फोर जी यानी चौथी पीढी के मोबाइल फोन में है। कैमरा, वॉयस रिकॉर्डर, एफएम, मीडिया प्लेयर, एमएमएस ..! एक छोटे से मोबाइल में इतनी सुविधाएं! यह आपके लिए चौंकाने वाली बात हो सकती थी, मगर नई पीढी तो अब टच स्क्रीन फोन गैजेट्स चाहती है। कंप्यूटर के नाम पर वह 40 एमबी हार्ड डिस्क और 128 एमबी रैम वाला डेस्कटॉप पाकर बाग-बाग नहीं हो जाएगी। सीआरटी मॉनिटर वह देखना ही नहीं चाहती। उसे टीएफटी चाहिए, जो सुविधाजनक और फैशनेबल हो, जिसमें ब्रॉडबैंड के साथ ही वीएलसी या साइबर लिंक मीडिया प्लेयर, वेबकैम जैसी सुविधाएं हों। इतने पर भी अब उन्हें लैपटॉप चाहिए।


हासिल करना हुआ आसान

किशोरों के लिए नए-नए गैजेट्स के बारे में जिज्ञासा वैसे ही है, जैसे आसपास की दुनिया के बारे में जानने की उनकी चाह। उसे हासिल करने की चाह भी वैसे ही है जैसे एक बच्चे का चांद-सितारे तोड लाने की जिद। फर्क सिर्फ यह है किबच्चा यह नहीं जानता कि चांद-सितारे पाए जाने लायक चीजें नहीं हैं, इसलिए वह उन्हें पाने की जिद करता है। जबकि किशोर जानता है कि चांद-सितारे पाए नहीं जा सकते, वह यह भी जानता है कि उन्हें पा लेना किसी काम का भी नहीं है। उनके सोचने-समझने की क्षमता बच्चों की तुलना में बहुत अधिक होती है। क्योंकि किशोरावस्था तक आते-आते उनके व्यक्तित्व के निर्माण की भावभूमि लगभग बन चुकी होती है। वे उन चीजों को पाना चाहते हैं, जो उनकी पहुंच में हैं और उनके काम की हैं। वे ज्यादातर चीजें पा भी रहे हैं। भारत में 15 से 24 की आयु वर्ग के लोगों का जेबखर्च 900 करोड रुपये प्रतिदिन आंका गया है। इसका सालाना आंकडा निकालें तो भारत के रक्षा बजट का तीन गुना आता है। इसका सबसे बडा हिस्सा गैजेट्स पर खर्च हो रहा है। सक्षम माता-पिता के किशोरों के पास नए गैजेट्स देखे जा सकते हैं।




किस सीमा तक जरूरी हैं गैजेट्स

सवाल यह है कि महंगे गैजेट्स की जरूरत उन्हें क्यों है? जरूरत मोबाइल फोन हो सकता है, उसमें कैमरा नहीं। यह सिर्फ स्टेटस सिंबल का मामला होता है, जिसका विस्फोटक नतीजा एमएमएस कांड के रूप में सामने आ चुका है। उनकी जरूरत कंप्यूटर हो सकता है, पर उसमें वेबकैम या वीएलसी की मौजूदगी जरूरत से इतर मामला है। ऐसी स्थिति में माता-पिता की जिम्मेदारियां बढ जाती हैं। उन्हें सिर्फ इसलिए कोई चीज न दें कि वे चाहते हैं, यह खयाल भी रखें कि कोई चीज न पाने के कारण उनके मन में कोई ग्रंथि न बनने पाए। इसके लिए आपको कोई बीच का रास्ता निकालना होगा।





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