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एक बार आ जाने के बाद आप यहां से नहीं जाएगे

Posted On: 24 Aug, 2012 मेट्रो लाइफ में

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glamour2आज से पांच दशक पहले की बात है गुजरात के एक गांव से एक युवक कमल राय हीरो बनने का सपना लेकर मुंबई आया। उसके साथ थी उसकी ठेठ देहाती पत्नी कोकिला। एक फिल्म निर्माता से मिलने यह युवक स्टूडियो आया। निर्माता से बातचीत की तो उन्होंने कहा कि आपके लिए मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा, लेकिन यदि आप चाहें तो आपकी पत्नी को जरूर रोल दे सकता हूं।


सुझाव अकल्पनीय था लेकिन सपने बहुत से हों और हकीकत कुछ और, तो जो मिल रहा हो उसे स्वीकार कर लेने में ही भलाई है, यही सोचते हुए कमल ने हां कर दी और वह विवाहिता स्त्री कोकिला निरूपा राय के नाम से रॉनक देवी नामक गुजराती फिल्म में हीरोइन बन कर आई। उसके बाद उन्होंने अनगिनत फिल्मों में हीरोइन का काम किया। उस समय, जब घर की बहू-बेटियों के लिए फिल्मों की बात करना भी गुनाह समझा जाता था, किसी विवाहिता के लिए परदे की रानी बनना आसान नहीं था, लेकिन यह भी सच है कि उस समय बडे पर्दे पर स्त्रियों की संख्या सीमित होने के कारण और निर्माताओं के पास उनके बहुत विकल्प न होने की वजह से उनका विवाहित होना या न होना कोई मायने नहीं रखता था। इसके बाद बहुत सी ऐसी हीरोइनें आई, जो विवाहिता होने के बाद भी सराही जाती रहीं व उनकी मार्केट वैल्यू पर भी विवाह का कोई विपरीत असर नहीं पडा।


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जगमगाती दुनिया है यह

ग्लैमर की जगमगाती दुनिया ऐसी है, जिसकी चकाचौंध से हर शख्स प्रभावित होता है। एक बार इस क्षेत्र में आने के बाद वहां से कोई जाना नहीं चाहता। यह जानने के बाद भी ग्लैमर की दुनिया में करियर की आयु बहुत कम होती है, युवतियां हर तरह का समझौता करने के लिए तैयार रहती हैं। सवाल केवल इस फील्ड का ही नहीं है, आधुनिक समाज की हर युवती व स्त्री इस शब्द के मोह से ग्रसित है। वह भी दिखना चाहती है ग्लैमरस व आकर्षक।


आत्मविश्वासी है आज की स्त्री

आज हर स्त्री अपनी पहचान अपने बलबूते बनाना चाहती है। वह जो कुछ भी है और जैसी भी है, अपने अस्तित्व को अपने काम के जरिए जिंदा रखना चाहती है। पहले जहां युवतियों को ग्लैमर से जुडे क्षेत्र में काम करने में संकोच होता था, आज वहीं वे अपने को ग्लैमरस दिखाने में कहीं कोई झिझक नहीं महसूस करतीं। उन्हें चाहिए खुला आसमान और उडने के लिए मजबूत पंख, जो मिल सकते हैं मनचाहा काम करके ही।


आज की युवती बेहद आत्मविश्वासी व सजग है। वह अच्छी तरह जानती है कि उसमें क्या खूबियां हैं और वह कैसे उनका फायदा ले सकती है। वह ऐसा कोई काम करने में नहीं झिझकती, जिसे करके उसे पहचान मिलती है। ग्लैमर के क्षेत्र में वह किसी प्रलोभन में नहीं फंसती, न ही आलोचनाओं से घबराती है। झिझक का दामन उसने कब का छोड दिया। वह अपने हर अच्छे-बुरे काम की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेती है।


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glamourआया है बदलाव

आज से कुछ समय पहले तक जब बहुत प्रतियोगिता नहीं थी ग्लैमर की फील्ड में, तब करियर के लिए विवाह से जुडी कोई शर्त नहीं थी। यदि आप आकर्षक और फिट हैं तो विवाहित होने पर भी आपको काम करने की पूरी आजादी थी। उस समय विवाहिताओं के सफल होने की एक मुख्य वजह यह थी कि उस समय अपनी छवि बनाने के लिए किसी प्रकार के ग्लैमर की जरूरत नहीं थी। अपनी जगह बनाने में अभिनय क्षमता व काम के प्रति निष्ठा पर बल दिया जाता था। आज हीरोइन हो या मॉडल, अपनी ग्लैमरस छवि के बल पर ही अपनी पहचान बनाती हैं। रैंप हो या परदा ग्लैमरस होना पहली अनिवार्यता है।



विवाह के बाद ग्लैमर में कमी आने पर व जिम्मेदारियां बढने पर उनके करियर के लिए भी चुनौती आ खडी होती है। आज कॉम्पटीशन के बढने से चॉइस भी बढ गए हैं। आज यदि आपके सामने एक की जगह बीस विकल्प हैं तो आप एक ही पर निर्भर नहीं हैं। अब वह जमाना गया जब एयरहोस्टेस को शादी करने या मां बनने के बाद यह एहसास करा कर कि आप सक्षम नहीं, जॉब से हटा दिया जाता था।


ग्लैमर क्या है

ग्लैमर ऐसी विशेषता है जिसे लेकर कोई लडकी जन्म नहीं लेती। यह किसी प्रकार का कुदरती तोहफा भी नहीं। इसे केवल प्रयासों के बल पर प्राप्त किया जा सकता है।


इस उक्ति ने सिद्ध कर दिया कि ग्लैमर कुदरत की देन नहीं, बल्कि अपने प्रयासों से कोई भी ग्लैमरस छवि पा सकता है। आकर्षक दिखना, प्रभावशाली व्यक्तित्व का होना, मुस्कराती छवि के साथ फोटोजनिक होना इस फील्ड में जगह बनाए रखने के लिए जरूरी होता है। यह सकारात्मक बदलाव है कि हमारे यहां काम करने वाली मेड भी अच्छे कपडे पहनना चाहती हैं और अपने को आकर्षक बनाने के लिए पार्लर भी जाती हैं।


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क्यों जरूरी है विवाह

अपवाद को छोड दें तो ऐसी कोई स्त्री नहीं जो विवाह संबंधों या रिश्तों में विश्वास न रखती हो। विवाह करने में थोडी देर भले हो जाए, शादी के निर्णय को कुछ दिनों के लिए टाला भले ही जाए, पर प्राय: ठुकराया नहीं जाता। विवाह वह सत्य है जो जीवन को पूर्णता देता है, आधार देता है। जीवन के विविध रंगों से परिचित कराता है।


यह भी कठोर सत्य है कि विवाह के बाद अपना काम किसी भी फील्ड की स्त्री के लिए आसान नहीं होता। ग्लैमर की फील्ड में काम करने वाली स्त्रियों के लिए शादी और भी मुश्किल इसलिए होती है क्योंकि वहां काम करने के घंटे नियत नहीं होते, उनका नेचर ऑफ जॉब एकदम अलग होता है।


भारतीय समाज की जो परिपाटी चली आ रही है, उसमें आज भी स्त्री के लिए पुरुष के मुकाबले कहीं अधिक जिम्मेदारियां हैं। वह अपने काम के साथ घर, बच्चों व समाज की तमाम जिम्मेदारियों को अकेले उठा रही होती है। ऐसे में वह एक ही समय में कई भिन्न रोल निभा रही होती है। अपने को घडी की सुइयों के साथ चलाते परिवार की जरूरतों को निभाते-निभाते वह मशीन बनती जा रही है। अपने को भूल कर उसने इस चुनौतीपूर्ण भूमिका में स्वयं को ला खडा दिया। घर व बच्चों को कौन कब संभालेगा, यह महत्वपूर्ण प्रश्न रहता है।


बदली है पुरुष की भूमिका

ऐसा नहीं है कि पुरुषों ने अपने को बदला नहीं है। आज समाज में बहुत से बदलाव आए हैं। पुरुषों ने भी स्त्री की ग्लैमरस क्षेत्र में चुनौतीपूर्ण भूमिका को समझा व सराहा है और अपने को भी बहुत बदला है।


आज का पति केवल टीवी या न्यूज पेपर पढने तक केंद्रित नहीं है वह बच्चे की नैपी बदलने से लेकर उसे पढाने व किचेन में खाना बनाने तक का काम खुशी-खुशी कर रहा है। उसे गर्व होता है जब उसकी पत्नी की बाहर तारीफ होती है। अब उसके लिए घर के कामों में मदद करना शर्मिदगी का कारण नहीं बनता।


क्या कहना है विशेषज्ञों का

दिल्ली की वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. जयंती दत्ता का कहना है कि मेरे पास एक सज्जन आए, वह अपनी पत्नी को शादी के पंद्रह साल बाद तलाक देना चाहते थे। कारण था उनकी पत्नी उन्हें गर्म चपाती नहीं देती थी। मैं हैरान रह गई कि पढा-लिखा यह व्यक्ति इस तरह की मानसिकता रखता है। दोनों पढे-लिखे थे, दोनों कामकाजी थे फिर यह शिकायत। शायद उन्होंने खुद से कभी एक कप चाय भी नहीं बनाई होगी। दूसरी तरफ एक मॉडल का पति था जो सुबह उठकर बच्चों को तैयार कर स्कूल छोड कर आता था उसका कहना था कि देर रात तक काम करने के कारण पत्नी ये जिम्मेदारी खुशी से उठा नहीं पाएगी।


डॉ. दत्ता का कहना है कि समाज में जो चेंज आए हैं उसकी प्रतिछाया ग्लैमर के क्षेत्र में भी दिखाई दे रही है। आज विवाहित स्त्रियां बेहद निष्ठा से अपने काम को अंजाम दे रही हैं। कहीं किसी प्रकार की कोई घबराहट या झिझक उन्हें विचलित नहीं करती।


चीजें आसान नहीं

इसमें संदेह नहीं कि सारी चीजें आसान नहीं हैं। निरंतर कई प्रकार के दबावों ने कामकाजी स्त्री को परेशान किया है। एक खलबली-सी सारे माहौल में है। ग्लैमरस क्षेत्र के लिए अपनी इमेज के साथ पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वाह उतना आसान नहीं, जितना ऊपर से दिखता है।


एक पत्नी और मां के कर्तव्य को कोई और पूरा नहीं कर सकता। ऐसे में जो विवाहित होने पर भी काम कर पा रही हैं उनके पीछे है सहयोग पति व ससुराल वालों का। हर कामकाजी स्त्री की आवश्यकाएं भिन्न होती हैं और उसे उन्हें निभाना पडता है। चुनौतियों से डर कर जो काम छोड देते हैं, यह उनका खुद का फैसला होता है, इसके लिए किसी और को जिम्मेदार ठहराना गलत होगा।


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