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होममेकर हूं इसमें गलत क्या है.....

Posted On: 23 Aug, 2012 मेट्रो लाइफ में

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house 2गृहिणी, हाउसवाइफ, होममेकर, डोमेस्टिक इंजीनियर, होम मैनेजर या घर की सीईओ..नाम में क्या रखा है! लेकिन जरा सोचिए, नाम में अगर कुछ न होता तो गृहिणी से होम मैनेजर या सीईओ तक ये संबोधन बदलते क्यों रहते! शायद ये बदलाव इसीलिए हैं कि घरेलू कार्यो की कीमत अब लोग समझने लगे हैं। होममेकर्स की जिम्मेदारियों को परिभाषित नहीं किया जा सकता, ये अंतहीन हैं। सुबह आंख खुलने से लेकर नींद से पलकेबोझिल होने तक सिर्फ जिम्मेदारियां। सुबह और शाम काम ही काम..


बाई गई छुट्टी पर

दीदी, मैं हफ्ते भर की छुट्टी पर जा रही हूं, आप मैनेज कर लेना.. काम वाली बाई जब सुबह-सुबह छुट्टी लेने का ऐलान करे और वह भी ठीक किसी त्योहार से पहले तो किसके पसीने नहीं छूटेंगे! वह छुट्टी पर न जाए, इसके लिए उसकी चिरौरी करनी पडती है, ढेरों प्रलोभन दिए जाते हैं और गिफ्ट्स भी।



एक फिल्म थी, अतिथि तुम कब जाओगे। इसके एक दृश्य में परेश रावल काम वाली बाई को झाडू ठीक से लगाने को कहते हैं तो वह झाडू पटक कर यह कहती हुई चली जाती है कि मैं कोई चुहिया हूं जो कोने-कोने में घुस कर सफाई करूंगी?


ऐसे जवाब रोज ही सुनने को मिलते हैं आम गृहिणियों को। महानगरों में अधिकतर स्त्रियां घर से बाहर निकल रही हैं और वहां डोमेस्टिक हेल्पर्स पर ही जिंदगी निर्भर हो गई है। मेड के भरोसे ही घर चलता है। इस दर्द को नौकरीपेशा स्त्रियां अच्छी तरह समझती हैं, जिन्हें अपनी तनख्वाह का एक मोटा हिस्सा मेड, आया, कुक या मेड एजेंसियों पर खर्च करना पडता है, इसके बावजूद संतुष्टि नहीं मिल पाती। एक स्त्री घर से बाहर कदम रखती है तो घर की व्यवस्था संभालना कितना मुश्किल होता है!


Read: प्यार में क्या चाहती है स्त्री


यहां कोई छुट्टी नहीं

जिस तरह करियर में अपना सौ फीसदी देना जरूरी है, उसी तरह घर भी पूर्ण समर्पण और समय की मांग करता है। यह फुल टाइम जॉब है, यहां न संडे की छुट्टी है, न होली-दिवाली की। छुट्टी के दिन तो यहां ओवरटाइम भी करना पडता है। यहां काम के घंटे निश्चित नहीं होते। फिर भी भला हो टेक्नोलॉजी का, जिसने स्त्रियों के लिए घरेलू कार्य कुछ आसान बना दिए हैं।


एक ग्लोबल एन.जी.ओ. हेल्थ ब्रिज द्वारा किए गए अध्ययन में कहा गया कि भारतीय स्त्रियां दिन भर में लगभग 16 घंटे काम करती हैं। इसमें घरेलू कार्यो के अलावा बच्चों को पढाना और कुछ बाहरी कार्य भी शामिल हैं। शहरी स्त्रियों की तुलना में ग्रामीण स्त्रियों को अधिक काम करना पडता है। यदि इन घरेलू कार्यो का मूल्य तय किया जाए तो भारतीय स्त्रियां वर्ष भर में यू.एस. के 612.8 बिलियन डॉलर्स के बराबर काम करती हैं।


कुछ नहीं में छिपा सब कुछ

आपकी पत्नी क्या करती हैं?

जी, कुछ नहीं, घर पर रहती हैं?

इतना पढ-लिखकर चूल्हे-चक्की में क्यों पिस रही हो..?


Read: मेरी उम्र के नाजुक मोड़ पर


घरेलू कार्यो के प्रति इस तरह के हिकारत भरे वाक्य बताते हैं कि ये काम कुछ नहीं की श्रेणी में आते हैं। शायद यही कारण है कि होममेकर्स के लिए मेहनतानेकी मांग समय-समय पर कई संगठन करते रहे हैं। कुछ समय पूर्व केरल में नेशनल हाउसवाइव्स यूनियन ने यह मांग उठाई थी कि हाउसवाइफ को घरेलू कार्यो व बच्चों की परवरिश के लिए न्यूनतम पारिश्रमिक व सामाजिक सुरक्षा दी जानी चाहिए। दिलचस्प बात यह है कि यह मांग नई नहीं है। यूक्रेन व वेनेजुएला जैसे देशों में भी ऐसे संगठन हैं।


दिल्ली की जानी-मानी नृत्यांगना और आई.ए.एस. अधिकारी शोभना नारायण बचपन की एक घटना का जिक्र करती हैं। एक बार कक्षा में टीचर ने सभी बच्चों से पूछा कि वे बडे होकर क्या बनना पसंद करेंगे? सभी ने जवाब दिए। तभी एक लडकी ने कहा कि वह हाउसवाइफ बनना पसंद करेगी। पूरी क्लास में ठहाके गूंज उठे। बाद में टीचर ने छात्रों को समझाया कि हाउसवाइफ बनना शर्म या मजाक की बात नहीं है, यह सबसे महत्वपूर्ण काम है।


इच्छा पर भारी मजबूरी

यूं तो होममेकर बनना या बाहर काम करना किसी स्त्री का अपना फैसला है, लेकिन कभी-कभी मजबूरी या जरूरत उनकी इच्छा पर भारी भी पडती है। कोई स्त्री करियर बनाना चाहती है, लेकिन घरेलू परिस्थितियां उसे घर पर रहने को मजबूर करती हैं। सेंटर फॉर वर्क-लाइफ पॉलिसी के एक अध्ययन के अनुसार, अधिकतर भारतीय स्त्रियां शादी के बाद घरेलू जिम्मेदारियों या बच्चे की परवरिश के कारण नौकरी छोडती हैं। एक हजार भारतीय स्त्रियों पर हुए इस सर्वे में से 51 फीसदी को विवाह के बाद और 52 प्रतिशत को बच्चा होने के बाद ऐसा दबाव महसूस हुआ। स्त्रियों ने माना कि ऑफिस के बाद घर जाकर सेकंड शिफ्ट का दबाव उन्हें कई बार घर पर ही रहने को मजबूर करता है।


Read: “वेश्या समझे जाने से आजादी मिले तो यही सही”

house3होममेकर बनाम कामकाजी स्त्री

होममेकर्स ज्यादा खुश हैं या नौकरीपेशा स्त्रियां? कभी-कभी होममेकर्स को अपनी स्थिति बुरी लगती है तो कई बार नौकरीपेशा स्त्रियां नाखुश दिखती हैं। दिल्ली की 55 वर्षीय कल्पना लांबा होममेकर हैं। वह एक कॉलेज में लेक्चरर थीं, लेकिन बच्चों की खातिर उन्हें जॉब छोडनी पडी। कहती हैं, जिन बच्चों की परवरिश केलिए मैंने नौकरी छोडी, उन्हीं के पास बाद में मेरे लिए समय नहीं रहा।

मैं रोज सुबह सबसे पहले उठती, पति और बच्चों के लंच बॉक्स तैयार करती और नाश्ते की टेबल पर उनका इंतजार करती। संडे को मेरा मन होता कि सबके साथ कहीं बाहर निकलूं तो बाकी लोग आराम के मूड में होते। हरेक की अपनी दुनिया थी, जिसमें मेरे लिए समय कम था। शादी के बाद बच्चे अपनी-अपनी गृहस्थी में मसरूफ हैं, पति रिटायर नहीं हुए हैं। मेरी लाइफ अभी भी वैसी ही है। अब अकेलापन खलता है। लगता है नौकरी छोडने का मेरा फैसला गलत था।



दूसरी ओर शादी के बाद एम.एन.सी. में अपने बेहतरीन करियर को छोडने वाली गुडगांव (हरियाणा) की नेहा शर्मा कहती हैं, पेरेंट्स की ख्वाहिश थी कि मैं नौकरी करूं, मैंने की। 3-4 साल मन लगा कर काम किया। पिछले साल मेरी शादी हुई तो मुझे लगा कि पति व परिवार को पूरा समय दूं। हो सकता है कि कुछ वर्ष बाद मैं दोबारा जॉब करूं, अभी तो घर मुझे अच्छा लग रहा है।


नॉन-वर्कर्स नहीं हैं होममेकर्स: सुप्रीम कोर्ट पिछले वर्ष दुर्घटना के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पार्लियामेंट को होममेकर्स की भूमिका पर पुनर्विचार करने को कहा। जस्टिस ए.के. गांगुली ने कहा, स्त्रियां घर बनाती हैं, समस्त घरेलू कार्य करती हैं, बच्चों की परवरिश करती हैं, उन्हें पाल-पोस कर बडा करती हैं। वे परिवार को अपनी जो सेवाएं देती हैं, उन्हें बाजार से नहीं खरीदा जा सकता। लेकिन खेद का विषय यह है कि उनके कार्यो का अब तक मूल्यांकन नहीं किया गया है।


वर्ष 2001 में हुई जनगणना में कहा गया था कि भारत में 36 करोड स्त्रियां नॉन-वर्कर्स हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि होममेकर्स को नॉन-वर्कर्स की श्रेणी में रखना उनके श्रम का अपमान करना है।


इस मामले में पीडित की पत्नी सडक दुर्घटना में मारी गई थी। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पीडित को ढाई लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। फैसले के खिलाफ व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। इस पर कोर्ट ने कहा कि मुआवजा तय करते समय होममेकर द्वारा किए गए हर कार्य का मूल्य आंका जाना चाहिए। उसकी आय को पति की कमाई का महज एक तिहाई मानना गलत है। सुप्रीम कोर्ट ने मुआवजे की रकम को ढाई लाख से बढा कर छह लाख रुपये किया। साथ ही अपील की तारीख से मुआवजे में ब्याज की राशि भी जोडने को कहा।


Read: ढेर खिलौने लेकर आया रे….


Please post your comments on: क्या आप भी यही सोचते है कि होममेकर बनना कोई गलती है ?


Tags: Immigrant women and wife assault, women wife beater, women and house, women and house of representatives



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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

डा श्याम गुप्त के द्वारा
August 25, 2012

————होम मेकर होना अधिक गौरव की बात है कि वे अपना घर बना रहीं हैं बिना बाहरी दवाब, लोभ, लालच व घर से बाहर जाने-आने की परेशानियों एवं अनीति में फंसने के अधिक अवसरों के………बाहर काम करने वाली तो दूसरों का घर बनाती हैं….जहां तक तर्क किया जाय कि बाहर कार्य करने वाली राष्ट्र का कार्य करती हैं तो अपनी संतान को अपने हाथों समर्थ बनाने से बेहतर कोई राष्ट्रीय कार्य नहीं होसकता| 

ravikar के द्वारा
August 25, 2012

नारी वादी सोच से, नहीं कहीं तकरार । किन्तु प्राथमिकता मिले, दोनों कुल परिवार । दोनों कुल परिवार, रखे अक्षुण मर्यादा । हो अपनों से प्यार, स्वयं से पक्का वादा । कर खुद का उत्थान, देश हित रख कर आगे । ईश्वर पर विश्वास, सरलतम जीवन मांगे ।

    Cheyanna के द्वारा
    June 11, 2016

    o copersucar mais bonito (e um dos carros mais bonitos de todos os tempos) foi o F6.também não andava nada, mas eu me lembro da sensação que foi no seu lançamento, com suas linhas absurdamente &qrdd;muteunas"…oesse eu queria um modelo.

ravikar के द्वारा
August 25, 2012

होलीडे इकदम नहीं, भर जीवन संघर्ष । यदा-कदा सिक लीव है, कठिन वर्ष दर वर्ष । कठिन वर्ष दर वर्ष , हर्ष के पल खुब पायी। नहीं कहीं प्रतिबन्ध, स्वयं से मन बहलायी। कोटि-कोटि आभार, मिली जो प्यारी माता । घर भर की आधार, हमारी भाग्य-बिधाता ।।

ravikar के द्वारा
August 25, 2012

एक वैवाहिक विज्ञापन देखिये – सास-ससुर पति ननद दो, भावी दो संतान। स्नेह-सूत्र में बाँध ले, जो कन्या मुस्कान । जो कन्या मुस्कान, व्यवस्था घर की सारी । एक्जीक्यूटिव रैंक, सैलरी रखे हमारी । मन श्रद्धा-विश्वास, परस्पर सुख-दुःख बांटे । बने धुरी मजबूत, गृहस्थी भर फर्राटे ।।


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