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पंचतंत्र का रहस्य जरूर जानना

Posted On: 20 Aug, 2012 मेट्रो लाइफ में

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दो मित्र थे- एक कबूतर और एक चूहा। दोनों अपने-अपने समूहों के मुखिया थे। एक बार कबूतर का पूरा झुंड एक बहेलिए के बिछाए जाल में फंस गया। तब उसने अपने साथियों को सुझाव दिया कि सभी एक साथ जोर लगाएं और जाल समेत उड चलें। इस तरह वे जाल समेत उड कर जंगल के दूसरे छोर पर मौजूद चूहे के पास पहुंचे। चूहे ने अपने मित्र को जाल में फंसा देखा तो उसने भी तुरंत अपने सभी साथियों को बुलाया और फटाफट जाल को काट डाला। इस तरह उसने कबूतरों को शिकारी के चंगुल से मुक्त कराया और दुनिया के सामने दोस्ती की बेहतरीन मिसाल पेश की।


हुम साथपंचतंत्र की यह कहानी मित्रता की शक्ति तो बताती ही है, इससे ज्यादा यह बताती है एकता और उसके जज्बे का असर। जाल में फंसा हर कबूतर अगर अपनी पूरी ताकत न लगाता तो शायद सभी पकडे और मारे जाते।यह उनकी एकता और मित्रता का ही नतीजा है जो वे शिकारी से बच सके। साथ ही, यह कहानी के हर पात्र की दक्षता के समुचित उपयोग का भी असर है। वैसे भारत का पूरा सामाजिक ढांचा ही इस बात का प्रमाण है कि यहां के लोग टीम भावना के महत्व से प्राचीन काल से ही सुपरिचित हैं। इसका प्रमाण हम संयुक्त परिवार की व्यवस्था में साफ तौर पर देख सकते हैं। शायद यही वजह है कि संयुक्त परिवार की जैसी प्रतिष्ठा तथा परिवार के सदस्यों के बीच एक-दूसरे के प्रति जैसी प्रतिबद्धता यहां दिखती है, वैसी कहीं और दिखाई नहीं देती। आज गांवों से लेकर महानगरों तक हम रह भले ही छोटे-छोटे कुनबों में बंटकर रहे हों, पर हमारे समाज में प्रतिष्ठा की बात यही है कि एक कुटुंब में दो-तीन पीढियों के सभी लोग एक छत के नीचे एक साथ रहें। भारतीय इतिहास के मध्यकाल को छोड दें तो शेष समय इसका व्यापक असर सामाजिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में भी देखा जा सकता है।


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परिवार से सरोकार

बीच के चार-पांच सौ वर्षो का इतिहास ऐसा है जब हम दुनिया की दूसरी संस्कृतियों से तो संघर्ष कर ही रहे थे, खुद अपने भीतर भी तमाम अंतर्विरोधों से जूझ रहे थे। इनसे उबरने की प्रक्रिया ही शुरू हुई है आजादी के बाद। अब दुनिया भर की तमाम संस्कृतियों से परिचित होने के बाद हम जिस निष्कर्ष पर पहुंच रहे हैं, वह फिर वही है। सभी अर्थो में गुणवत्तापूर्ण जीवन की संयुक्त परिवार से बेहतर व्यवस्था दूसरी नहीं हो सकती।


इस व्यवस्था की सबसे बडी खूबी यह है कि इसमें परिवार के हर सदस्य को यथोचित स्नेह और सम्मान मिलता है। जरूरी नहीं कि योग्यता, क्षमता और आय की दृष्टि से सभी बराबरी पर हों, लेकिन परिवार में महत्व सबका बराबर होता है। परिवार के बाहर उनका सामाजिक स्तर भी लगभग बराबरी का ही होता है। समान अधिकार और महत्व का यह बोध ही दायित्वों के प्रति भी उनमें समानता का भाव पैदा करता है। समानता का यह भाव ही उनके बीच गहरे लगाव का कारण बनता है, जो अच्छे समय के भरपूर सदुपयोग और बुरे समय से निबटने का पूरा जज्बा देता है। जब इतिहास के परिप्रेक्ष्य में देखा गया कि खास तौर से संकटकालीन स्थितियों से निबटने के लिए तो यह एक लाजवाब जज्बा है तो सबसे पहले इसका प्रयोग दिखा सेनाओं में। फिर क्रांतिकारी समूहों और आंदोलनकारियों में। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जब दुनिया के नए सिरे से निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई तो वही जज्बा उन संगठनों में आया जो समाज के पिछडे वर्गो और क्षेत्रों के उत्थान, कुरीतियों के उन्मूलन और दुनिया के भौतिक-बौद्धिक विकास के निमित्त समर्पित भाव से काम करने के लिए स्वयं अपनी इच्छा से सबसे पहले आगे आए।


व्यावसायिकता में सहकारिता

जल्द ही यह बात दूसरे क्षेत्रों के जिम्मेदार लोग भी समझने लगे और फिर अस्पतालों के ऑपरेशन थियेटर से लेकर इंजीनियरिंग एवं तकनीकी प्रोजेक्ट, वैज्ञानिक अनुसंधानों, फिल्म निर्माण और खेल के मैदानों तक यह जज्बा दिखने लगा। पूरा पारिभाषिक अर्थ देने वाले मुहावरे के तौर पर टीम स्पिरिट शब्द का प्रयोग इसी दौर में शुरू हुआ।

सही पूछिए तो नए दौर में इसे पूरी सार्थकता दी है विभिन्न क्षेत्रों के पेशेवर लोगों ने। यह कहना गलत नहीं होगा कि भूमंडलीकरण के दौर में जिन भारतीय संस्थानों ने अपना वजूद बचाया और लगातार विकास किया, उन्होंने टीम स्पिरिट के दम पर ही किया। जो संस्थान यह मानते रहे कि टीम बनाना और उसमें जज्बा पैदा करना तो केवल फौजी अफसरों का काम है, उन्हें इतिहास बनते देर नहीं लगी।


यह इस जज्बे का असर ही था जिसे देखकर हर क्षेत्र में इसे तेजी से अपनाया गया। अधिकतम संस्थानों में मौजूद हर व्यक्ति की प्रतिभा व क्षमता के पूरे उपयोग की परंपरा शुरू हुई। यह बात समझी गई कि कोई भी व्यक्ति पूरी तरह नाकाबिल नहीं होता और न किसी के बगैर कोई काम ही रुकता है। ईश्वर ने कुछ न कुछ प्रतिभा हर शख्स को दी है, जरूरत उसे सही परिवेश देकर उभारने की है। प्रशिक्षण सत्र व कार्यशालाओं के आयोजन इसी क्रम में शुरू किए गए। मनुष्य को एक संसाधन के रूप में देखने और उसके विकास की प्रक्रिया शुरू हुई। यह अलग बात है कि भारत में अभी भी कई क्षेत्रों की तरह इस क्षेत्र में भी स्त्रियां कम हैं, पर पश्चिम में यह क्षेत्र स्त्रियों की विशेषज्ञता वाला ही माना जाता है। हालांकि यदि टीम भावना की जडें तलाशें तो वह भारतीय संस्कृति में ही दिखाई देंगी। आज भी बडे परिवारों की एकता और उनकी सहकारिता में केंद्रीय भूमिका अकसर किसी स्त्री की ही होती है।


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साधारण लोग असाधारण उपलब्धि

इसके पहले कि हम टीम स्पिरिट को परिभाषित करें यह देखना जरूरी है कि टीमवर्क है क्या। अमेरिकी उद्यमी एंड्रयू कार्नेगी के अनुसार, एक साझा उद्देश्य के लिए साथ काम करने की क्षमता ही टीमवर्क है। साथ ही यह व्यक्तियों को संगठनात्मक लक्ष्य हासिल करने के लिए प्रेरित करने का भी नाम है। यह वह ऊर्जा है जो सामान्य व्यक्ति को विशिष्ट लक्ष्य हासिल करने के काबिल बना देती है।


प्रेरणा ही वह तत्व है जिसके लिए टीम का नेता मुख्य रूप से जिम्मेदार होता है। प्रबंधन गुरु प्रमोद बत्रा कहते हैं, नेता की रफ्तार ही पूरी टीम की रफ्तार होती है। नेता अच्छी रफ्तार से काम करे, यानी निश्चित समय में असाधारण लक्ष्य हासिल कर सके, इसके लिए वह टीम के चयन के स्तर से ही सतर्क ता बरतने को जरूरी मानते हैं। श्री बत्रा के अनुसार, जब आप टीम के लिए चयन कर रहे हों तो हमेशा ऐसे लोगों को चुनें जो स्वत: प्रेरणा से संपन्न हों। ऐसे लोगों को अपनी टीम में शामिल करने से बचें जिनमें खुद कुछ करने का जज्बा न हो। क्योंकि तब आपको अपना अधिकतम समय उन्हें प्रेरित करने पर खर्च करना पडेगा और ऐसी स्थिति में नियोजन और गुणवत्ता नियंत्रण का कार्य पीछे छूट जाएगा। इस तरह समय और श्रम के साथ-साथ धन का भी अपव्यय होगा और आपको लक्ष्य हासिल करने में अनावश्यक देर होगी।


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व्यक्ति और व्यवस्था

इसका यह मतलब बिलकुल नहीं है कि स्वत: प्रेरित लोगों को बाहरी प्रेरणा की जरूरत बिलकुल नहीं होती। अच्छे लोग अपनी क्षमताओं का पूरा इस्तेमाल करें, इसके लिए उन्हें उचित परिवेश दिए जाने की जरूरत होती है। जैसा कि अमेरिकी बेस्टसेलर लेखक स्टीफेन आर. कॅवे कहते हैं, अगर आप अच्छे लोगों को खराब व्यवस्था में रख दें तो बुरे नतीजे ही मिलेंगे। आखिर जिन पौधों को आप पनपते देखना चाहते हैं, उन्हें पानी तो आपको देना ही होगा। अच्छी व्यवस्था का अर्थ स्पष्ट करते हैं प्रमोद बत्रा, एक अच्छा नेतृत्व वह है जो अपने खराब और कमजोर साथियों को भी सुधार और विकास का पूरा अवसर दे। जिसे यह समझ हो कि हर शख्स का काम करने का अपना तरीका होता है। कोई तेजी से काम करता है तो कोई धीरे-धीरे। कोई काम की गुणवत्ता का ज्यादा खयाल रखता है तो कोई मात्रा का। एक अच्छा टीमलीडर वह है जो काम की प्रकृति के अनुसार उसे करने के लिए सही व्यक्ति का चयन करे।

जो खराब काम की आलोचना करे तो शिष्ट ढंग से और अच्छे काम की प्रशंसा के मामले में पूरी तरह उदार हो। जो खराब काम की सजा देते समय सहृदयता और अच्छे काम का पुरस्कार देने में उदारता बरते तथा इस मामले में व्यक्तिनिष्ठ न होकर वस्तुनिष्ठ हो। यह बात हमेशा याद रखें कि सफल हमेशा वही होता है जो खुद अपनी आलोचना सुनने के मामले में धैर्यवान और करने वालों का कद्रदान हो।


टीम पर भरोसा

ऐसा वही कर सकता है जिसे अपनी टीम पर पूरा भरोसा हो और टीम पर भरोसा वही करता है जिसे खुद पर विश्वास हो। इस संदर्भ में अमेरिकी दार्शनिक राल्फ वाल्डो इमर्सन का विचार काबिलेगौर है, लोगों पर भरोसा करें, वे आपके प्रति सत्यनिष्ठ होंगे। उनके प्रति ऐसा बर्ताव करें जैसे वे महान हैं, यकीन करें वे महान लोगों जैसा ही आचरण करेंगे।

श्री बत्रा इस संदर्भ में दुर्याधन-शकुनि और श्रीकृष्ण-अर्जुन का उदाहरण देते हैं, दुर्योधन के सलाहकार शकुनि जैसे चाटुकार थे। राज्य के हित से उनका कोई मतलब नहीं था। उन्हें सिर्फ अपने स्वार्थ साधने थे। इसलिए वे वही कह रहे थे जो दुर्योधन सुनना चाहता था। दूसरी तरफ अर्जुन के सलाहकार श्रीकृष्ण थे, जिनका कोई स्वार्थ नहीं था। वे अर्जुन की झूठी तारीफ करने के बजाय हमेशा उन्हें सही सलाह देते थे। चाहे भले ही उनकी बात अर्जुन को बुरी लगे। नतीजा सबके सामने है।


श्री बत्रा टीम स्पिरिट के मार्ग में तीन तत्वों को बाधक मानते हैं और वे हैं- क्रोध, ईष्र्या और बदले की भावना। कहते हैं, इन भावनाओं से टीम के नेता ही नहीं, सदस्यों को भी बच कर रहना चाहिए। ये भावनाएं किसी बडे जहाज के तले में छेद के समान हैं, जो उसे लक्ष्य तक पहुंचने से बहुत पहले ही डुबा देता है।

इसलिए अगर आप टीम में काम करते हैं या किसी टीम का नेतृत्व करते हैं तो एक जापानी कहावत हमेशा याद रखें, हममें से कोई उतना स्मार्ट नहीं है, जितने हम सब हैं। साथ ही जानें टीमवर्क और टीम स्पिरिट के मसले पर विभिन्न क्षेत्रों की मशहूर हस्तियों के अहम खयालात।


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