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मेरी उम्र के नाजुक मोड़ पर

Posted On: 19 Aug, 2012 मेट्रो लाइफ में

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youthये कहां आ गए हम

किशोर उम्र के बदलावों में सबसे अहम हैं शारीरिक बदलाव। अचानक होने वाले बदलावों को मन स्वीकार नहीं कर पाता। किसी से शेयर करने में हिचक होती है, लगता है मानो सारी आजादी छिन गई हो। लडकों-लडकियों में अलग-अलग तरह के बदलाव होते हैं। यही वह उम्र भी है, जब मानसिक-भावनात्मक और बौद्धिक विकास की प्रक्रिया गति पकडती है। मन किसी एक बात पर ठहर नहीं पाता और दिमाग सवालों से भर उठता है।



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उम्र का अजीब खेल

1. मन में कई सवाल पनपने लगते हैं। क्यों? कब? कहां? ऐसे प्रश्न इसी उम्र में जन्मते हैं।

2. आजादी पर थोडा भी प्रतिबंध उन्हें बाधक लगता है। वे स्कूल के नियमों और माता-पिता के आदेशों को चुनौती देने लगते हैं।

3. अपने ढंग से चीजों को सही-गलत और अच्छा-बुरा समझने की बुद्धि आ जाती है। यह सामान्य-सहज प्रक्रिया है।

4. प्री-टीन और टीनएज में अचानक एहसास होने लगता है कि हम कुछ भी कर सकते हैं और जो करेंगे, वह गलत नहीं होगा। यह एक बडा बदलाव होता है, जो माता-पिता के लिए मुश्किलें खडा करता है।

5. खुद को आकर्षक महसूस करने लगते हैं टीनएजर्स। खास तौर पर लडकियों में आईने में खुद को निहारना, सौंदर्य प्रसाधनों का प्रयोग, ड्रेसेज को लेकर सजगता जैसे तमाम गुण इसी उम्र में पनपते हैं।

6. दोस्तों के साथ घंटों समय बिताने, फोन करने और माता-पिता से कुछ छिपा लेने की मानसिकता भी इसी उम्र की देन है।

7. मूड स्विंग, भावनात्मक उथल-पुथल, अनावश्यक रुलाई जैसे लक्षण भी हार्मोनल बदलाव के कारण होते हैं।


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मुश्किल है बहुत फिर भी

बच्चों का टीनएज में आना माता-पिता के लिए एक साथ कई मुश्किलें खडी करता है। इस उम्र में किशोर अपनी रचनात्मकता के शीर्ष पर होते हैं, लेकिन अगर चूक हो जाए तो विध्वंसक होने में भी देर नहीं लगती। ऐसी स्थिति में माता-पिता को किशोर मनोविज्ञान के इन तथ्यों को जरूर ध्यान में रखना चाहिए-


1. आम तौर पर किशोरों के लिए शारीरिक बदलावों को समझ पाना मुश्किल होता है। वे चिडचिडे हो जाते हैं, साथ ही साथियों के साथ अपने बदलावों की तुलना करके वे और भी चिंतित हो जाते हैं। उन्हें समझाएं कि आप भी इसी तरह बडे हुए थे और इसमें असामान्य कुछ भी नहीं। उन्हें अपने अनुभव सुनाएं।

2. उनके शारीरिक बदलावों, खास तौर पर वजन बढने-घटने को लेकर उन्हें ताने न दें।

3. अगर बढते बच्चे ज्यादा प्रतिक्रियावादी हो जाएं, हर बात पर जवाब देने लगें तो बजाय उन्हें सजा देने के, उनकी बातों को ध्यान से सुनें और उनके स्तर पर जाकर उनके तर्को को समझने की कोशिश करें।

4. छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करना सीखें। उनकी ड्रेसेज, हेयर स्टाइल्स पर कमेंट करने के बजाय यह ध्यान दें कि उनका सर्किल कैसा है। दोस्त गलत दिशा में तो नहीं ले जा रहे! यानी छोटे बदलावों के बजाय जो बडे प्रश्न हैं, उन्हें सुलझाने की कोशिश करें।

5. उन्हें जिम्मेदारियां सौंपें। अपने छोटे-छोटे निर्णय खुद लेने को प्रोत्साहित करें, ताकि वे अपनी योग्यता साबित कर सकें।

6. यदि आपको लगता है कि वे नियंत्रण से बाहर हो रहे हैं, दोस्तों के साथ ज्यादा वक्त बिता रहे हैं तो उनसे दोस्तों को घर लाने को कहें। हमउम्र दोस्तों की तरह व्यवहार करें। जरूरत पडे तो मनोवैज्ञानिक की राय भी लें।

7. दूसरे अभिभावकों के अनुभवों का फायदा उठाएं। उनसे पैरेंटिंग टिप्स लें।


पारिवारिक मसला

1. 90 फीसदी अवसादग्रस्त किशोर घरेलू विवादों के चलते परेशान होते हैं। हालांकि उन्हें झगडे का कारण नहीं पता होता।

2. 46 फीसदी अवसादग्रस्त टीनएजर अच्छे से अच्छा परिणाम लाने के माता-पिता के दबाव से परेशान हैं।

3. 50 फीसदी इसलिए अवसाद में हैं, क्योंकि उनके अभिभावक उनकी जिंदगी के हर पहलू को नियंत्रित करना चाहते हैं।


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