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जिनसे रौशन है जहां

Posted On: 1 Mar, 2012 में

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indian womenआशा भोंसले, पा‌र्श्वगायिका

उपलब्धियां: 20 भाषाओं में क्लासिकल फिल्मी गीत, गजल, भजन और पॉप गीत। एक (आगामी) फिल्म के लिए अभिनय।


सम्मान: दादा साहब फालके पुरस्कार, पद्मभूषण, गिनीज बुक ऑफ व‌र्ल्ड रिकॉ‌र्ड्स (2011)सर्वाधिक स्टूडियो रिकॉर्डिग (11000 गीत) का सर्टिफिकेट।


दीनानाथ मंगेशकर की पुत्री और भारत कोकिला लता मंगेशकर की बहन आशा भोसले की राहें आसान नहीं थीं। शुरू में उन्हें बी व सी ग्रेड की फिल्में ही मिलीं। उनके करियर में मील का पत्थर साबित हुई फिल्म नया दौर। इसके बाद तो उनकी आवाज का जादू कुछ ऐसा छाया कि आज तक लोग उसमें बंधे हैं। वह जितनी गहराई से भजन गा सकती हैं, उतनी ही नजाकत से गजलें भी। ओ.पी. नैय्यर, खय्याम, सचिन देव बर्मन, आर.डी. बर्मन, जयदेव, शंकर जयकिशन, इलैया राजा, ए.आर. रहमान जैसे दिग्गज संगीत निर्देशकों के साथ उन्होंने काम किया। वह पहली भारतीय गायिका थीं, जिन्हें ग्रैमी अवॉर्ड के लिए नामांकित किया गया।


कुछ समय पूर्व दिल्ली में 23वें गिनीज बुक ऑफ व‌र्ल्ड रिकॉ‌र्ड्स के अवॉर्ड समारोह में शिरकत करने आई आशा जी ने भावुक होकर कहा कि यह अवॉर्ड पाकर उन्हें लग रहा है कि वह विश्वस्तरीय गायिका हो गई हैं। हालांकि उन्हें मालूम था कि वही सबसे ज्यादा गीत रिकॉर्ड करने वाली गायिका हैं, लेकिन वह चुप रहीं। उन्होंने कहा कि जब तक उनकी सांसें चलेंगी, वह गाती रहेंगी। हालांकि आधुनिक संगीत की आलोचना करने से वह नहीं चूकीं। उन्होंने कहा कि यह बिना रूह के इंसान जैसा है। आशा को उनके चाहने वाले आने वाले दिनों में ऐक्टिंग के फील्ड में भी देखेंगे।

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रचना चौरसिया

वाइस चेयर पर्सन, वुमेन कमेटी (इंटरनेशनल ताइक्वांडो फेडरेशन) चेयरपर्सन ताइक्वांडो एसोसिएशन ऑफ इंडिया।


उपलब्धि: ताइक्वांडो में छठा डेन पाने वाली एशिया की पहली महिला।


कुछ अलग व बेहतर करने के लिए हर पल परीक्षा देनी होती है। सिर्फ इसलिए नहीं कि आप महिला हैं, इसलिए भी कि आपको खुद के साथ ही अपनों का विश्वास न खोना पडे, कहती हैं 40 वर्षीया रचना चौरसिया।


वह नागपुर की हैं, लेकिन उनके सपनों को मंजिल मिली दिल्ली आकर, हालांकि यह शहर उनके लिए अनजान था। कहती हैं वह, मेरी स्टाइल लोगों को पसंद नहीं थी। मुझे बाहरी होने का एहसास होता था। लेकिन मैंने अपना उत्साह बनाए रखा। पुरुष साथियों को रिंग में पटखनी देते हुए मैं असीम ऊर्जा महसूस करती थी।


पापा व भाई नहीं चाहते थे कि रचना इस प्रोफेशन में आएं। लेकिन मां ने उनका साथ दिया। वह कहती हैं, खुद पर भरोसा जरूरी है, लेकिन अपनों का भरोसा भी हो तो हर मंजिल आसान हो जाती है।


वर्ष 1986 में वह इंटरनेशनल ताइक्वांडो में आई। इसके तीन साल बाद पहला डेन और छह डेन तक पहुंचने में 22 साल तक कडा संघर्ष करना पडा। गौरतलब है कि डेन ताइक्वांडो की सर्वोच्च डिग्रियां हैं, जो मुश्किल से ही मिल पाती हैं। स्त्रियों के लिए तो यह क्षेत्र अभी बिलकुल नया है। अपने ही संस्थान के वरिष्ठ ताइक्वांडो ट्रेनर राजेंद्रन से उन्होंने विवाह किया। इस दंपती का एक बेटा है, जिसे वह अपनी जिंदगी का सबसे बडा तोहफा मानती हैं।

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बछेंद्रीपाल, पर्वतारोही

उपलब्धि: 1984 में माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली पहली भारतीय महिला।


सम्मान: पद्मश्री

उत्तराखंड के उत्तरकाशी में जन्मी बछेंद्री पाल के दिल में पहली बार पर्वतारोहण का जज्बा तब जगा, जब उन्होंने स्कूल की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में 400 मीटर की चढाई की। इसके बाद उन्होंने नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग से प्रशिक्षण लिया। पहली बार 1984 में भारत के चौथे माउंट एवरेस्ट चढाई में हिस्सा लिया। इससे पहले पूरी दुनिया में चार स्त्रियां ही इसे फतह करने में कामयाब हुई थीं।


अभी वह जमशेदपुर में टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन के एडवेंचर अभियान की प्रमुख हैं। इसके तहत भारत सहित विश्व के कई देशों में माउंटेनियरिंग अभियान आयोजित किए जाते हैं। कहती हैं बछेंद्री, अभियान से जुडना बडा तोहफा है मेरे लिए। अब तो स्त्रियां भी बडी संख्या में माउंटेनियरिंग के लिए प्रेरित हो रही हैं। साल में एक बार उनके लिए अभियान चलाए जाते हैं। कोशिश होती है कि हर जगह की स्त्रियां शामिल हों। वह फिर कहती हैं, नेचर एक विशाल क्लासरूम है, जहां सीखने का कोई अंत नहीं है। हम अभी लीडरशिप स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम चला रहे हैं। बेस कैंप उत्तरकाशी में है।


बछेंद्री कहती हैं, स्त्रियां कमजोर नहीं हैं। आत्मविश्वास के साथ आगे बढें और अकेले निकलने का हौसला अपने भीतर रखें तो वे सब कुछ कर सकती हैं।

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अपराजिता गोगाई, नेशनल कॉर्डिनेटर

सेंटर फॉर डेवलपमेंट एंड पॉपुलेशन एक्टिविटीज (सीईडीपीए)


उपलब्धि: गार्जियन (लंदन) द्वारा वर्ष 2011 में जारी दुनिया की शीर्ष 100 स्त्रियों में नाम शामिल।


उत्साह और जज्बा इनके चेहरे से दिखता है। दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा के बाद अपराजिता ने जर्नलिज्म व फिल्ममेकिंग का कोर्स किया। स्त्रियों के आर्थिक सशक्तीकरण विषय पर काम करते हुए लगा कि वह यही काम करना चाहती हैं। इसके बाद एक एनजीओ में काम किया तो पता चला कि भारत में प्रसव के दौरान हर साल 60-70 हजार स्त्रियों की मौत हो जाती है और इस तरह व्हाइट रिबन एलाइंस का गठन किया गया।


कहती हैं अपराजिता, स्त्रियों की सेहत चिंतनीय मुद्दा है। इसके दो कारण हैं, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और लिंगभेद। जहां ज्यादा जरूरी है वहां स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं। दूसरी ओर लडकी को बचपन से सही पोषण नहीं दिया जाता। आंकडे बताते हैं कि विश्व की 20 प्रतिशत प्रसव संबंधी मौतें सिर्फ भारत में होती हैं। इसके बावजूद यह बडा मसला नहीं है। गोगोई कहती हैं, अगर मां को ही सही पोषण नहीं मिलेगा तो बच्चे कैसे स्वस्थ रहेंगे! जरूरत है कि इन मुद्दों पर दुगनी मेहनत की जाए, सोशल साइट्स के जरिये मुहिम जगाई जाए। स्त्री शिक्षा के लिए काम किया जाए और इसकी मुहिम जगाए हमारा युवा वर्ग। केरल में जहां सौ फीसदी साक्षरता है, वहां स्त्री स्वास्थ्य का स्तर भी ठीक है। इस मुद्दे पर सभी को आगे आना होगा, तभी थोडी सफलता की उम्मीद की जा सकती है।

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शबाना आजमी, ऐक्ट्रेस-एक्टिविस्ट

उपलब्धि: पद्मश्री और पद्मभूषण।


हिंदी सिनेमा में शबाना एक क्रांति का नाम है। समर्थ कलाकार के अलावा वह कर्मठ कार्यकर्ता भी हैं। 1988 में पद्मश्री के बाद हाल ही में उन्हें पद्मभूषण से नवाजा गया है। पुणे के फिल्म एवं टेलीविजन इंस्टीट्यूट से अभिनय की बारीकियां सीखीं और पहली ही फिल्म अंकुर (1974) से उन्होंने जाहिर कर दिया कि किसी परिपाटी का अनुसरण नहीं करने वाली हैं। इस फिल्म के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। निशांत, शतरंज के खिलाडी, स्पर्श, अर्थ, मासूम, मंडी, खडंहर, पार जैसी सफल फिल्में उनकी झोली में हैं। उन्हें पांच राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार हासिल हुए।


वह झुग्गी झोपडी के हक में लडने वाली संस्था निवारा हक सुरक्षा समिति की सदस्य बनीं। 1986 में कोलाबा की 25 वर्ष पुरानी झुग्गी-झोपडी को बचाने के लिए भूख हडताल पर बैठीं। दिल्ली के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में जब उन्हें पहली अंग्रेजी फिल्म के प्रीमियर पर बोलने को कहा गया, तो वह नाट्यकर्मी सफदर हाशमी की खुलेआम हत्या पर बोलीं। वह वर्ष 1997 में राज्य सभा की सदस्य रहीं।


वह मशहूर शायर स्व.कैफी आजमी की बेटी व गीतकार जावेद अख्तर की पत्नी हैं। कैफी के देहांत के बाद वह उनकी संस्था मिजवां वेलफेयर सोसायटी के कार्यो को वह आगे बढा रही हैं। इसके तहत वह लडकियों को सिलाई-कढाई की ट्रेनिंग दे रही हैं। शबाना कहती हैं, मैं हमेशा सही समय पर सही स्थान पर रही। फिल्मों में आई तो समानांतर सिनेमा की शुरुआत हुई। फिर सही समय पर हॉलीवुड का रुख किया और अब मैं ऐसे माहौल में हूं, जहां उम्र की कोई बंदिश नहीं है।

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मीनू वढेरा, विमेन कैब सर्विस प्रोवाइडर

उपलब्धि: विमेन ड्राइवर्स को आत्मरक्षा की ट्रेनिंग देकर रोजगार के मौके दिलाना।


दिल्ली-एनसीआर की असुरक्षित सडकों पर सरपट दौडती टैक्सियों के स्टेयरिंग पर कोमल हथेलियों की पकड मजबूत होती जा रही है। कमर्शियल कैब चलाती इन महिला ड्राइवर्स में गजब का आत्मविश्वास नजर आता है और इन्हें यह नया आत्मविश्वास दिया है मीनू वढेरा ने। आजाद फांउडेशन (एनजीओ) की डायरेक्टर मीनू ने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से ग्रेजुएशन किया है। जब विदेशों में महिला चालकों को सहजता से कमर्शियल कैब चलाते देखा तो सोचा ऐसा भारत में क्यों नहीं हो सकता!


हमने उन महिलाओं को ताकतवर बनाने की कोशिश की है, जो आर्थिक रूप से कमजोर थीं और जिनके पास कमाई का कोई जरिया नहीं था। हमने इनकी सुरक्षा की भी पूरी व्यवस्था की है, कहती हैं मीनू।


सुरक्षा के मद्देनजर इन महिला ड्राइवर्स को आत्मरक्षा का प्रशिक्षण दिया गया है, जिसमें मार्शल आर्ट भी शामिल है, ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने में ये सक्षम हों। अभी मीनू टैक्सी सर्विस के अलावा प्लेसमेंट सर्विस भी चला रही हैं, जिसके तहत मासिक पगार पर घरों और संस्थानों को फीमेल ड्राइवर्स भेजी जाती हैं।

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कैप्टर इंद्राणी सिंह, एशिया की फ‌र्स्ट वुमन कमांडर

उपलब्धि: एयरबस ए-300 जेट विमान की पहली भारतीय महिला कमांडर, एशिया की पहली महिला वाणिज्यिक पायलट और लिटरेसी इंडिया की फाउंडर सेक्रेटरी।


कैप्टन इंद्राणी अभी अपनी संस्था के जरिये बच्चों व महिलाओं के लिए शिक्षा व ट्रेनिंग की व्यवस्था कर रही हैं। यह अलग बात है कि बचपन में उन्हें स्कूल देर से पहुंचने पर सजा मिला करती थी। फुर्सत मिले तो वह माउंटेनियरिंग, एडवेंचरस स्पो‌र्ट्स में हिस्सा लेना चाहती हैं। ट्रैक्टर से ट्रक तक सब चला सकती हैं, लेकिन शर्ट के बटन टांकना और साडी बांधना उन्हें मुश्किल काम लगता है।


1983 में उन्होंने एनसीसी के तहत ग्लाइडर उडाना शुरू किया और इसके बाद इंडियन एयरलाइंस में काम शुरू किया। बाद में वह पहली ऑफिसर, कैप्टन और कमांडर बनीं। इतनी चीजें एक साथ कैसे मैनेज करती हैं? कहती हैं इंद्राणी, मैं घर की अकेली लडकी थी, इसलिए शुरू से लडकों की तरह काम करने की आदत रही।


इन 20-25 सालों में बहुत परिवर्तन आया है। कहती हैं वह, एयरलाइंस में आई तो मैं अकेली स्त्री थी, लेकिन आज काफी संख्या में लडकियां आगे आ रही हैं। वैसे आज भी घर-बाहर एक साथ संभालना स्त्रियों के लिए आसान नहीं है। लेकिन कुछ पाने की आकांक्षा है तो खोने के लिए भी तैयार रहना चाहिए। हम पति-पत्नी एक ही प्रोफेशन में रहे, लिहाजा हमारी शेयरिंग अच्छी रही। मुझे परिवार ने भी भरपूर सहयोग दिया। आज इंद्राणी स्त्रियों व बच्चों की शिक्षा के लिए काम कर रही हैं। कहती हैं, हरियाणा में स्त्रियां अब तक क्राफ्ट से दूर थीं, लेकिन मैं उन्हें इस क्षेत्र में भी ट्रेनिंग दे रही हूं।

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फिरदौस शेख, को-फाउंडर, बाइकरनी ग्रुप

उपलब्धि: बाइकरनी ग्रुप की स्थापना।


कोई बाधा इनके उत्साह को नहीं कम कर सकती। जब वह रॉयल इनफील्ड बाइक पर निकलती हैं तो लोग चकित रह जाते हैं।

होश संभालने के साथ ही इस जांबाज लडकी ने बाइक राइडिंग को जुनून बना लिया और भारी मोटरसाइकिलों पर लंबी यात्राओं के साथ स्टंट करने निकल पडीं। फिरदौस जानती हैं कि जरा सी चूक मौत का पैगाम लेकर आ सकती है, लेकिन डर शब्द उनकी डिक्शनरी में नहीं है। पुणे की फिरदौस दस साल की उम्र से बाइक चला रही हैं। बहुत छोटी थीं तो 50 सीसी की छोटी बाइक चलाई थी और फिर नहीं रुकीं।


फिरदौस शेख ने पुणे में ऑल विमेन बाइक राइडिंग एसोसिएशन बाइकरनी बनाई है। वह कहती हैं, मैंने सोचा भी नहीं था कि इतनी लडकियां जुडेंगी। हमें एक प्लैटफॉर्म चाहिए था, हमने कर दिखाया।


अनजान राहों पर भी वह नहीं डरतीं। फुर्सत मिलते ही लॉन्ग ड्राइव पर निकल जाती हैं। वह रेस ट्रैक पर ही गाडी भगाती हैं, सडक पर संभल कर चलती हैं। उन्होंने विदेशी कारें 270 किमी./घंटे की स्पीड से चलाई हैं।

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वंदना लूथरा, वेलनेस एक्सपर्ट

संस्थापक : वीएलसीसी

सम्मान : बीते साल फॉरच्यून द्वारा जारी 50 सर्वाधिक पावरफुल बिजनेस विमेन की सूची में शामिल। एंटरप्राइज एशिया वुमन एंटरप्रेन्योर ऑफ द ईयर 2010, राजीव गांधी अवॉर्ड 2008, आउटस्टैंडिंग बिजनेस वुमन अवॉर्ड 2007।


दिल्ली विश्वविद्यालय की ग्रेजुएट वंदना लूथरा ने न्यूट्रिशन और कॉस्मेटोलॉजी में उच्च शिक्षा जर्मनी से हासिल की। इसके बाद लंदन से ब्यूटी केयर, फिटनेस, फूड और न्यूट्रिशन तथा स्किन केयर के कुछ कोर्स किए। फिर अपने वेलनेस ब्रैंड की स्थापना की। वंदना सामाजिक कार्यो से जुडी हैं। विकलांग और गरीब बच्चों के अलावा ओबेसिटी जैसे गंभीर मुद्दे पर भी काम कर रही हैं। कहती हैं, ओबेसिटी विश्व की गंभीर समस्या है। यह साइलेंट किलर है। इसके सामाजिक-मनोवैज्ञानिक खतरों के बारे में भी मैं बताना चाहती हूं। उनका मानना है, अच्छी सेहत का कोई शॉर्टकट नहीं है। सेहत को लेकर आ रही जागरूकता अच्छा संकेत है, लेकिन स्त्रियों से मेरा कहना है कि फिटनेस का अर्थ साइज जीरो नहीं है। खूबसूरत दिखना हर स्त्री का हक है, लेकिन स्वस्थ व फिट रहना अधिक जरूरी है। इसके लिए सही खानपान व नियमित व्यायाम ही एकमात्र रास्ता है।

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साइना नेहवाल, बैडमिंटन खिलाडी

उपलब्धियां: व‌र्ल्ड जूनियर बैडमिंटन चैंपियनशिप जीतने वाली पहली भारतीय, ओलंपिक्स में सिंगल्स क्वार्टरफाइनल तक पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला, बैडमिंटन व‌र्ल्ड फेडरेशन की ओर से विश्व की चौथी वरीयता प्राप्त बैडमिंटन खिलाडी।


सम्मान: खेल रत्न। साइना कहती हैं, हमारे देश में अब बैडमिंटन में ट्रेनिंग सुविधाएं बहुत अच्छी हैं, इसलिए जो भी लडकियां इस फील्ड में आना चाहती हैं, वे मेहनत के बल पर आगे बढ सकती हैं। मैं खुद हैदराबाद के गोपीचंद अकेडमी से ट्रेनिंग ले रही हूं। लेकिन बैडमिंटन ऐसा खेल है, जिसमें शारीरिक ताकत और मेहनत बहुत जरूरी है सफलता के लिए। दिन भर में 8-8 घंटे प्रैक्टिस करते हैं हम। तुलनात्मक रूप से देखें तो डबल्स के मुकाबले सिंगल्स अधिक कठिन है। इसके लिए फिटनेस और सही खानपान का ध्यान रखना पडता है। थोडी सी भी चोट हमारे करियर को नुकसान पहुंचा सकती है।


यहां तक पहुंचने के लिए साइना को कडा परिश्रम करना पडा है। कहती हैं, जब मैं महज नौ वर्ष की थी, सुबह चार बजे उठ कर 25 किलोमीटर दूर स्टेडियम जाती थी।


गौरतलब है कि साइना के पिता इन्हें डॉक्टर बनाना चाहते थे। साइना कहती हैं कि अगर वह बैडमिंटन खिलाडी न होतीं तो मेडिकल प्रोफेशन में होतीं। साइना के कृषि वैज्ञानिक पिता हरवीर सिंह कहते हैं, खेलों में साइना की प्रतिभा निखरी तो हम हरियाणा से दूर हैदराबाद आ गए, ताकि उसे सही ट्रेनिंग मिल सके। हम उसके खानपान का पूरा ध्यान रखते थे। मैं भाग्यशाली हूं कि आज लोग मुझे मेरी बेटी के नाम से जानते हैं।

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छवि राजावत

सरपंच सोढा गांव (राजस्थान)


उपलब्धियां: बिजनेस मैनेजमेंट की डिग्री का उपयोग ग्रामीण विकास में करना।


संयुक्त राष्ट्र में गरीबी दूर करने पर चल रही बहस में जब भारत के ग्राम सरपंच के बोलने की बारी आई तो यू.एन. के सदस्यों को लगा कि साडी पहनी हुई कोई संकोची सी युवती होगी, लेकिन जब जींस-टॉप में छवि राजावत उनसे मुखातिब हुई तो विदेशियों के मुंह खुले रह गए। उनके सामने खडी वह सरपंच तो बॉलीवुड ऐक्ट्रेस सी दिख रही थी। कभी वह क्रिकेट खेलती दिखती हैं तो कभी विकास कार्यो का जायजा लेती।


छवि ने ग्रामीण भारत की बदली तसवीर पेश की है दुनिया के सामने। एयरटेल के सीनियर मैनेजमेंट का हिस्सा रही छवि को कॉरपोरेट ग्लैमर और शहरी जीवन बांध नहीं सका। टोंक जिले के छोटे से गांव सोढा की राजपूत बाईसा हैं छवि। जब गांव वालों ने उनसे चुनाव लडने को कहा तो उन्होंने हाई प्रोफाइल करियर त्याग दिया। वह महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) की बैठकों में हिस्सा लेती हैं और दुनिया के मंच पर भारतीय गांवों का प्रतिनिधित्व करती हैं। वह रणनीति के तहत विकास-कार्य करती हैं। गांव वाले कहीं गलत हों तो उन्हें डांटने से भी नहीं चूकतीं। वह भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग व सामाजिक बदलाव की लडाई लडना चाहती हैं।


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